बदायूं

Budaun News: मलेरिया के मरीज बढ़े पर विभाग के पास मच्छरदानी नहीं

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सफाई नहीं होने से गांवों के हालात खराब पर बचाव के उपाय नाकाफी

संवाद न्यूज एजेंसी

बदायूं। गांवों में फैली गंदगी लोगों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है। हालात ये है कि जिले में लगातार बुखार से मौत के मामले सामने आ रहे हैं। बावजूद इसके न तो गांवों में ठीक से सफाई हो पा रही है और न ही मरीजों को मच्छरदानी का वितरण किया जा रहा है।

मच्छरजनित बीमारियों के लिहाज से जिला संवेदनशील जनपदों की श्रेणी में शामिल है। ऐसे में जिले के दातागंज, समरेर, जगत, सालारपुर, कादरचौक ब्लॉक के अलावा सैदपुर, म्याऊं के गांवों समेत करीब 100 गांव हाईरिस्क श्रेणी में हैं। हर साल बुखार की वजह से यहां कई लोगों की जान चली जाती है। इसके बावजूद मलेरिया विभाग केवल औपचारिकता निभाता नजर आ रहा है।

गौर करने वाली बात यह है कि मलेरिया विभाग को सन 2020 में भारत सरकार की तरफ से 2.60 लाख लांग लास्टिंग इंसेक्टिसाइड नेट (एलएलआईएन) उपलब्ध कराई गई थी। उस दौरान उनका वितरण कराया गया। उस समय सभी मच्छरदानी वितरित नहीं हो सकी थीं। ऐसे में कुछ मच्छरदानी 2021 में बांटी गईं। वहीं करीब 1100 मच्छरदानी विभाग ने पिछले साल वितरित कीं। जिसके बाद स्टॉक पूरी तरह खत्म हो गया।

उसके बाद शासन को डिमांड भेजने के बाद भी मच्छरदानी नहीं मिलीं। अब जबकि जिले में कई लोग बुखार से पीड़ित हैं और कई लोगों की मौत भी हो चुकी है तो विभाग केवल मच्छरदानी लगाने के लिए सिर्फ प्रेरित करता नजर आ रहा है।

एलएलआईएन में यह है विशेषता

एलएलआईएन की खास बात यह भी है कि इस पर जो केमिकल लगाया गया है वह करीब तीन साल तक प्रभावी रहता है। इन्हें डेल्टामेथ्रिन कीटनाशक के घोल में डुबोकर स्पेशल बनाया जाता है। इस कीटनाशक मच्छरदानी पर बैठने के बाद मच्छर और अन्य कीट-पतंगे तुरंत मर जाते है।

क्या है डेल्टामेथ्रिन

डेल्टामेथ्रिन और साइंफैनोथ्रिन विशेष प्रकार की कीटनाशक दवाएं हैं। यह मच्छरों और कीट-पतंगों को दूर भगाने और उनको मारने का काम करती हैं। फिनायल, फॉगिंग समेत अन्य कीटनाशकों में अलग-अलग प्रकार से डेल्टामेथ्रिन का इस्तेमाल किया जाता है।

तीन साल पहले विभाग को मच्छरदानी मिलीं थी। उस दौरान उनका वितरण कराया गया था। जो बची थीं, उनका वितरण जरूरत के हिसाब से 2021 व 2022 में करा दिया गया। विभाग की ओर से एक बार फिर मच्छरदानी की डिमांड भेजी जा चुकी है।

-योगेश सारस्वत, जिला मलेरिया अधिकारी


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