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महंगाई के आंकड़े: ठीक-ठाक दर में गिरावट, पर नहीं मिले मोटे गेहूं, चावल, दाल से राहत

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भारत मुद्रास्फीति अद्यतन: बुधवार 14 जून 2023 को मई के महीने के लिए ठीक देय शुल्क का पात्र आया है जो 2015 के बाद सबसे निचले स्तर -3.48 प्रतिशत पर जा रहा है। इसी तरह सोमवार 12 जून को मई महीने के लिए ऑनलाइन प्रवेश द्वार का पात्र घोषित कर दिया गया। इन आंकड़ों के अनुसार रिकॉर्ड दर 25 महीने के निचले स्तर 4.25 प्रतिशत पर घटक आच्छादित है। गोपनीयता का अधिकार भी 2.91 प्रतिशत पर आ जाता है। पर सवाल उठता है कि प्रत्यक्ष रूप से प्रत्यक्ष रूप से लोगों को राहत मिल रही है? क्या बाजार में जरूरी खाने-पीने की चीजें सस्ती हैं?

व्हीटीरी-चावल की झलक पर ध्यान दें

जिस दिन प्रत्यक्ष दस्तावेजों के आंकड़े उसी दिन घोषित किए गए, सरकार ने सभी बढ़ते हुए शेयरों को रखने की सीमा को फिक्स कर दिया। तो इसके साथ ही सरकार ने अपने बफर स्टॉक से ओएमएस के तहत खुले बाजार में गेहूं के साथ चावल की बिक्री का भी एलान कर दिया जिससे बाजार में बढ़ते डर का आभास होने लगा।

व्हीटी – चावल के दस्तावेजों में देखें

डिपार्टमेंट ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स का प्राइस मॉनिटरिंग डिविजन जो जरूरी संकेतों की निगरानी करता है, इसके डेटा को देखें तो पिछले महीने में गेहूं से लेकर चावल की देनदारी में सभी को मिला है। एक मई 2023 को गेहूं का औसत मूल्य 28.74 रुपये किलो था जो 13 जून को 27 पैसे प्रति किलो लाकर 29.1 रुपये प्रति किलो पर जा पहुंचता है। एक मई 2023 को चावल का औसत मूल्य 38.48 रुपये किलो था जो 13 जून को 1.21 रुपये बरबर 39.69 रुपये प्रति किलो हो गया है। एक मई को आटा 34.23 रुपये प्रति किलो में मिल रहा था जो 15 पैसे बढ़ा 13 जून को 34.38 रुपये प्रति किलो में मिल रहा था।

अरहर, उड़द दाल की सेल

दाल की झलक भी आम लोगों को परेशान कर रही है। एक मई 2023 को अरहर दाल सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बाजार में 116.68 रुपये प्रति किलो में मिल रहा था जो 13 जून को 9.55 रुपये की शेयर के साथ 126.23 रुपये किलो में मिल रहा है। उड़न दाल एक मई को 108.23 रुपये में मिल रहा था जो 13 जून को 111.08 रुपये प्रति किलो में मिल रहा था। मूंग एक मई को 107.29 रुपये में मिल रहा था जो 109.17 रुपये प्रति किलो में मिल रहा है। चीनी भी इस अवधि में महंगी हुई है।

सूचना से राहत नहीं

खाने की इन जरूरी चीजों को देखते हुए मन में ये सवाल उठता है लाजिमी है कि दाखिल दर के आंकड़े क्या प्रत्यक्ष में दर्जी घटने की वरीयता बता रहे हैं या ये आंकड़े से दूर हैं?

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