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Bareilly News: परिवारों को भनक नहीं, क्या कर रहे उनके लाडले

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बरेली। सीबीगंज की घटना के साथ ही इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि परिवारों की जानकारी के बिना उनके लाडले बच्चे अपराध व अन्य अनैतिक गतिविधियों में लिप्त हो रहे हैं। सहनशीलता व धैर्य की कमी और नकारत्मकता हावी के कारण किशोरावस्था में ही असहज और मायूस होकर गलत कदम उठा रहे हैं। मनोविज्ञानियों के पास इस तरह के मामले अक्सर आ रहे हैं। अधिकांश मामलों में बच्चों से परिजनों की दूरी और सोशल मीडिया में दोनों पक्षों की ज्यादा व्यस्तता से समस्या उपजी है।

केस वन

रोज हाथ की नस काट रही थी किशोरी

– शहर निवासी 17 साल की किशोरी नामी स्कूल की छात्रा है। उसके माता-पिता कई दिन से परेशान थे। बेटी रोज हाथ या पैर में ब्लेड मारकर नस काट रही थी। समय रहते उस पर निगरानी से परिजन उसे बचा तो पा रहे थे लेकिन समस्या का समाधान नहीं मिल पा रहा था। वह लोग उसे मनोवैज्ञानिक के पास लेकर गए। वहां लंबी वार्ता और भरोसे में लेने के बाद किशोरी ने बताया कि कॉलेज में वह जिस लड़के को चाहती है, वह लड़का उसे पसंद नहीं करता। उसने सार्वजनिक रूप से उसे नकार दिया, तभी से उसे जीवन बोझ लग रहा है। समझाने पर किशोरी सामान्य होने लगी है।

केस टू

लड़के से बात करते देख डांटा तो अवसाद में आई

– एक किशोरी के बारे में बताया गया कि वह अवसाद की स्थिति में है। वह किसी से बात नहीं कर रही। अकेले में गुमसुम बैठी रहती है। पढ़ाई में भी मन नहीं लगता। किशोरी को मनोवैज्ञानिक के पास लाया गया तो काफी मशक्कत के बाद उसके मन की गांठ खुली। किशोरी ने बताया कि उसके कॉलेज में सह शिक्षण की व्यवस्था है। वहां लड़कियां और छात्र आपस में एकदूसरे से बात करते हैं और नोट्स भी बदलते हैं। उसके माता-पिता पुराने ख्याल के हैं। मां ने एक बार उसे मोबाइल पर सहपाठी छात्र से बात करते देख लिया। इसके बाद उसे उल्टा-सीधा कहा। तब से माता-पिता उससे खराब व्यवहार करते हैं, उसे लगता है कि वह परिवार पर बोझ है।

फोटो-अनुग्रह एडमंड

बच्चों से संवाद बढ़ाएं, बदलावों पर ध्यान दें

– किशोर उम्र में शरीर में तेजी से बदलाव होते हैं। हार्मोंस का उतार-चढ़ाव टीन एजर्स के विचारों में भी व्यापक बदलाव आता है। परिजनों की टोकाटाकी उन्हें बुरी लगती है। इन दिनों सोशल मीडिया और मोबाइल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी एक वजह है जो बच्चों को परिजनों से दूर कर रहा है। माता-पिता भी अपने कामकाज के अलावा बच्चों को समय नहीं दे पाते। उन्हें बच्चों को पूरा समय देना चाहिए। उनके दोस्तों व गतिविधियों के बारे में जानकारी रखनी चाहिए। असफलता, अस्वीकार्यता जीवन का अहम हिस्सा है, बच्चे यह नहीं समझ पाते। परिजनों व शिक्षकों को इस बारे में उन्हें बताना चाहिए और सकारात्मक दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। – अनुग्रह एडमंड, मनोवैज्ञानिक, मिलिट्री अस्पताल


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