बदायूं

Budaun News: जीत फात्मा की… पर चुनौतियों का सामना कर आबिद बने ‘लीडर’

Connect News 24

– सपा जिलाध्यक्ष समेत बड़े नेता भी विरोधी के रूप में थे सामने

– मुख्यमंत्री योगी की जनसभा का भी नहीं पड़ा जनता पर असर

संवाद न्यूज एजेंसी

बदायूं। शहर सीट से चुनाव भले ही फात्मा रजा जीती हों, लेकिन इसमें प्रमुख भूमिका उनके पति पूर्व विधायक आबिद रजा की ही रही। भाजपा के सामने बिना पार्टी सिंबल के निर्दलीय लड़ना खुद में ही एक चुनौती थी तो मुख्यमंंत्री योगी के आगमन के बाद संजीवनी पा चुकी भाजपा को हराना भी मुश्किल था। फात्मा को जीत दिलाकर आबिद इस चुनाव में ‘लीडर’ बनकर उभरे।

सपा ने इस चुनाव में केवल अलापुर और दातागंज में सिंबल दिए थे। बाकी जगहों पर सिंबल न देने के कारण कार्यकर्ता असमंजस में थे। इसका असर यह रहा कि जिसको जहां जगह मिली, वह वहां समर्थन देने चला गया। शहर सीट से चुनाव मैदान में डटी नाजमी भी खुद को सपा समर्थित बता रहीं थीं। पार्टी द्वारा सिंबल न देने की बात पर चुप्पी साधे बैठे जिलाध्यक्ष आशीष यादव ने जब एकाएक नाजमी को समर्थन देने का ऐलान कर दिया तो कार्यकर्ताओं के सामने और मुश्किल खड़ी हो गई। इसके बाद एक के बाद एक नेता नाजमी के साथ दिखने लगे।

सपा अल्पसंख्यक सभा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. यासीन अली उस्मानी समेत पिछला विधानसभा चुनाव लड़ चुके हाजी रईस अहमद ने खुला समर्थन नाजमी को दे दिया। अपनों की बेरुखी से आबिद का पलड़ा कमजोर माना जाने लगा था। अब एक तरफ भाजपा खड़ी थी तो दूसरी ओर सपा के दूसरे नेता भी विरोध में थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आगमन ने भाजपा प्रत्याशी समेत कार्यकर्ताओं में भी जोश भर दिया था। ऐसे में आबिद के सामने खुली चुनौती थी कि निर्दलीय रहते हुए भी जीत कैसे हासिल करें।

इसके अलावा एक चुनौती और भी थी, जिसका सामना उन्हें करना था। चुनाव में केवल चार प्रत्याशी हिंदू जबकि छह प्रत्याशी मुस्लिम थे। ऐसे में मुस्लिम वोट के कटने की भी गुंजाइश थी, लेकिन आबिद की बनाई गई रणनीति ने न केवल फात्मा को जीत दिलाई, बल्कि मतदान प्रतिशत को देखते हुए जीत का अंतर भी काफी बड़ा रहा। इसके अलावा फात्मा रजा के पिछले दो साल के कार्यकाल समेत आबिद के पालिकाध्यक्ष रहते समय कराए गए विकास के काम भी उनकी जीत का आधार बने।


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