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नागरिक बोध का अभाव – क्या केवल सरकार के द्वारा ही विकसित भारत का सपना पूरा होगा? डॉ. विनय खण्डेलवाल

स्वच्छ, सुरक्षित और समृद्ध भारत के लिए नागरिक जागरूकता अनिवार्य

Connect News 24

भारत आज विकास के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। विश्व मंच पर देश की बढ़ती प्रतिष्ठा, आधुनिक अवसंरचना, डिजिटल क्रांति, स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ, स्वच्छता अभियान और जनकल्याणकारी योजनाएँ एक नए भारत की तस्वीर प्रस्तुत कर रही हैं। सरकारें विकास के लिए अरबों रुपये खर्च कर रही हैं, नई नीतियाँ बना रही हैं और नागरिकों को बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या केवल सरकार के प्रयासों से विकसित भारत का सपना साकार हो सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर है—नहीं।

किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल सरकार की योजनाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके नागरिकों के आचरण, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व पर भी समान रूप से निर्भर करती है। दुर्भाग्यवश, भारत में नागरिक बोध (Civic Sense) की कमी एक गंभीर सामाजिक चुनौती के रूप में उभर रही है, जो विकास की गति को प्रभावित कर रही है।हमारे दैनिक जीवन में इसके अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं। एक ओर सरकार स्वच्छ भारत अभियान चलाती है, दूसरी ओर लोग सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकने से नहीं हिचकते। करोड़ों रुपये खर्च कर सड़कों और सार्वजनिक स्थलों का निर्माण किया जाता है, लेकिन कुछ लोग उन पर थूकने, गंदगी फैलाने या उन्हें क्षतिग्रस्त करने में संकोच नहीं करते। यातायात नियमों की अनदेखी, गलत दिशा में वाहन चलाना, लालबत्ती पार करना, हेलमेट एवं सीट बेल्ट का उपयोग न करना तथा अनावश्यक हॉर्न बजाना हमारी सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है।विडम्बना यह है कि हम अक्सर व्यवस्था की कमियों पर प्रश्न उठाते हैं, लेकिन स्वयं की जिम्मेदारियों पर उतना ध्यान नहीं देते। यदि कोई सड़क गंदी है तो हम सरकार को दोष देते हैं, लेकिन यह नहीं सोचते कि उस गंदगी में हमारा भी योगदान हो सकता है। यदि यातायात व्यवस्था बिगड़ती है तो हम प्रशासन को जिम्मेदार ठहराते हैं, जबकि नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकांश लोग स्वयं नागरिक ही होते हैं।वास्तव में, नागरिक बोध केवल नियमों का पालन करने तक सीमित नहीं है। यह सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति समझने, पर्यावरण की रक्षा करने, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने, कतार व्यवस्था का पालन करने, करों का ईमानदारी से भुगतान करने तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाने की भावना है। यही भावना किसी भी सभ्य और विकसित समाज की पहचान होती है।आज सरकारें स्वच्छता, हरित पर्यावरण, जल संरक्षण, यातायात सुधार, डिजिटल सेवाओं और सार्वजनिक सुविधाओं के विस्तार के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। किंतु जब नागरिक स्वयं इन पहलों में सहयोग नहीं करते, तब अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो पाते। सरकारी योजनाएँ तभी सफल होती हैं जब उनमें जनता की सक्रिय भागीदारी और जिम्मेदार व्यवहार शामिल हो।विश्व के अनेक विकसित देशों की सफलता के पीछे केवल उनकी आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि उनके नागरिकों का अनुशासित व्यवहार भी है। वहाँ स्वच्छता किसी अभियान का विषय नहीं, बल्कि जीवन शैली का हिस्सा है। कानून का पालन किसी मजबूरी से नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार के रूप में किया जाता है। यही कारण है कि सरकारी प्रयासों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है।भारत में नागरिक बोध के विकास के लिए केवल दंडात्मक व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए परिवार, विद्यालय, महाविद्यालय, सामाजिक संस्थाएँ, धार्मिक संगठन, मीडिया और प्रशासन सभी को मिलकर कार्य करना होगा। बच्चों को प्रारम्भ से ही यह सिखाना होगा कि राष्ट्र निर्माण केवल मतदान करने तक सीमित नहीं है; यह रोजमर्रा के छोटे-छोटे व्यवहारों से भी जुड़ा हुआ है।आज आवश्यकता एक नए सामाजिक आंदोलन की है—ऐसे आंदोलन की जो नागरिक अधिकारों के साथ-साथ नागरिक कर्तव्यों पर भी बल दे। जब तक प्रत्येक भारतीय यह नहीं समझेगा कि राष्ट्र की प्रगति में उसका व्यक्तिगत योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सरकार का, तब तक विकास की अनेक योजनाएँ अपने पूर्ण उद्देश्य तक नहीं पहुँच पाएँगी।विकसित भारत का मार्ग केवल संसद, सचिवालयों और सरकारी कार्यालयों से होकर नहीं गुजरता; वह हमारे घरों, सड़कों, विद्यालयों, बाजारों और दैनिक व्यवहारों से होकर भी गुजरता है। यदि हम वास्तव में एक स्वच्छ, सुरक्षित, अनुशासित, संवेदनशील और समृद्ध भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें सरकार से पहले स्वयं को बदलना होगा।राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत नींव सरकार नहीं, बल्कि जागरूक, जिम्मेदार और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक होते हैं। जिस दिन भारत का प्रत्येक नागरिक सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति, स्वच्छता को अपना दायित्व और अनुशासन को अपनी पहचान मान लेगा, उस दिन विकसित भारत का स्वप्न केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक वास्तविकता बन जाएगा।

— डॉ. विनय खण्डेलवाल
शिक्षाविद्, समाजसेवी एवं समाज चिंतक
बरेली, उत्तर प्रदेश


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