बदायूं

Budaun News: सिर्फ आश्वासनों में जिताते रहे करीबी, अपनों से हारी भाजपा

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Close ones kept winning only in assurances, BJP lost to its own people

हार-जीत की घोषणा होने से पहले ही मतगणना स्थल से अपने समर्थकों के साथ बाहर जातीं दीपमाला गोयल (फ

– चुनाव प्रचार में लगे लोग दिलाते रहे जीत का झूठा भरोसा, पार्टी के नेता देते रहे भितरघात

– एक तीर से दो निशाने साधे विरोधी गुट ने, जिलाध्यक्ष की पत्नी भी थीं टिकट की दावेदार

सौरभ सक्सेना

बदायूं। भितरघात करके अपनों को कैसे हराया जाता है, इसका उदाहरण शहर सीट से बेहतर नहीं मिल सकता। लोगों के मुताबिक, इस चुनाव में हार दीपमाला गोयल की नहीं, बल्कि भाजपा की हुई है। इस हार का कारण भी उनके अपने ही हैं। दीपमाला को उनके करीबी केवल बातों में ही जिताते रहे, जबकि दूसरी ओर उनका विरोधी गुट उनकी हार का ताना-बाना पहले ही बुन चुका था।

भाजपा में हर चुनाव में दावेदारों की लंबी लाइन लगती है। जब से केंद्र और प्रदेश में लगातार दो बार सरकार बनी है तब से तो यह संख्या और बढ़ गई है। अब कमल के फूल को जीतने की गारंटी माना जाने लगा है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव की बात छोड़ दें तो निकाय चुनाव में दर्जनभर से ज्यादा प्रत्याशी सामने आते रहे हैं। चाहे पिछला चुनाव हो या इस बार का, हर बार प्रत्याशी चयन में भाजपा को जूझना पड़ा है। इस बार भी शहर सीट से 14 लोगों ने आवेदन किए थे। टिकट की लाइन में निवर्तमान अध्यक्ष दीपमाला गोयल के साथ जिलाध्यक्ष राजीव गुप्ता की पत्नी शुभ्रा गुप्ता समेत कई लोग थे लेकिन इन दोनों का ही नाम सबसे ऊपर था।

जो लोग जिले की राजनीति में जरा भी जानकारी रखते हैं उन्हें यहां पार्टी की गुटबाजी के बारे में भी अच्छे से पता है। एक गुट दूसरे को पनपने नहीं देना चाहता तो दूसरा गुट भी पहले गुट की लगातार टांग खींचने में लगा रहता है। इस चुनाव में भी यही हुआ और भाजपा की हार का कारण उसके अपने ही बन गए। दरअसल, दीपमाला गोयल के विरोधी गुट को अच्छी तरह पता था इस बार जनता में उनका विरोध ज्यादा है और उनकी जीत की राह आसान नहीं है। इसके अलावा यह गुट जिलाध्यक्ष की पत्नी का टिकट भी नहीं होने देना चाहता था।

ऐसे में एक तीर से दो निशाने साधने की तैयारी करते हुए इस गुट ने दीपमाला गोयल को टिकट दिलाने में पूरी ताकत लगा दी। लोगों का कहना है कि इसके पीछे मंशा थी कि एक तरफ जिलाध्यक्ष की पत्नी का टिकट कट जाएगा और दूसरी ओर यदि दीपमाला चुनाव हार जाती हैं तो उनका राजनीतिक भविष्य भी खतरे में आ जाएगा। हुआ भी यही और इस गुट की मंशा पूरी हो गई।

टिकट का कुछ नेताओं ने किया था विरोध

जब पार्टी में दीपमाला गोयल को टिकट देने की चर्चा पक्की हो गई तो कुछ लोगों ने पार्टी हाईकमान से विरोध दर्ज भी कराया था, हालांकि दूसरा गुट उन्हें किसी तरह समझाने में कामयाब हो गया और दीपमाला को टिकट मिल गया। इसके बाद विरोध करने वाले चुनाव प्रचार में शामिल तो हुए, लेकिन अंदरखाने उनकी नाराजगी बरकरार रही।

थोड़ी नाराजगी तो थी लेकिन व्यवहार से कोई नहीं था खफा

लोगों के मुताबिक, दीपमाला गोयल के कार्यकाल में जनसमस्याओं का निदान न होने के कारण उनसे नाराजगी तो थी, लेकिन उनके व्यवहार से कोई खफा नहीं था। यह बात दूसरा गुट भी अच्छी तरह जानता था इसलिए टिकट में देरी के साथ उन्हें जीत के आश्वासन देकर उलझाकर रखा गया। इस कारण उनका लोगों से संपर्क नहीं हो पाया, जो हार की एक और वजह बना।

सदर विधायक के क्षेत्र से हारे दो भाजपा प्रत्याशी

सदर विधायक महेश गुप्ता की साख भी इस चुनाव में दांव पर लगी थी, लेकिन शहर में ही भाजपा प्रत्याशी की जीत नहीं हो सकी। उनके विधानसभा क्षेत्र में आने वाले वजीरगंज में भी भाजपा प्रत्याशी संगीता वार्ष्णेय को हार का सामना करना पड़ा। शहर में सदर विधायक के वार्ड में बने बूथ पर मतदान प्रतिशत भी कम रहा। बूथ एक पर 30.94 प्रतिशत, बूथ दो पर 37.42 प्रतिशत, बूथ तीन पर 55.76 प्रतिशत व बूथ चार पर 61.12 प्रतिशत मतदान हुआ।

वजीरगंज में भी गुटबाजी के कारण हुआ भाजपा का नुकसान

केवल शहर सीट ही नहीं, नगर पंचायत वजीरगंज में भी पार्टी के इन्हीं दो गुटों की गुटबाजी के कारण भाजपा प्रत्याशी को हार का मुंह देखना पड़ा। लोगों के अनुसार, चुनाव में भाजपा की जीत पक्की मानी जा रही थी, लेकिन भाजपा से बागी होकर चुनाव लड़ीं शकुंतला वार्ष्णेय के पति राहुल वार्ष्णेय पर एक गुट का हाथ था तो दूसरा गुट संगीता को चुनाव लड़ा रहा था। नतीजा जो हुआ, वह सबके सामने है।


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