Bareilly News: दुनिया को लुभा रहा बरेली का बांस, कारोबार 30 करोड़ के पार
बरेली। बांस बरेली के नाम से मशहूर शहर में बने बांस-बेंत के फर्नीचर दुनिया को लुभा रहे हैं। कारोबारियों के मुताबिक यहां बने बांस-बेंत के फर्नीचर बीते चार वर्षों से यूरोप, फिलिपींस, डेनमार्क सहित अन्य देशों को भी निर्यात हो रहे हैं।
बरेली में कई दशकों से बांस-बेंत के फर्नीचरों का कारोबार होता है। बीते सात साल से निर्यातक कुत्ते-बिल्ली के लिए बेड, फीडर और टब भी बना रहे हैं। बांस-बेंत के आभूषण भी बाजार में उपलब्ध हैं। इसमें ईयरिंग, नेकलेस, चेयन, नोज पिन, की रिंग आदि शामिल हैं। घरेलू महिलाएं बैंबू मिशन के तहत प्रशिक्षण लेकर ये काम कर रहीं हैं। निर्यातक उनके तैयार माल को खरीदकर ऑर्डर के अनुसार भेजते हैं।
बांस-बेंत के गिफ्ट बास्केट, मिरर फ्रेम, लैंप शेड, कप-प्लेट, जग, मग, केतली, बोतल, गमले भी तैयार हो रहे हैं। साथ ही, साेफा, कुर्सी, टेबल, डायनिंग सेट, डेकोरेशन आइटम, वाॅल हैंगिंग की मांग खूब हो रही है।
आसाम, त्रिपुरा से मांगते हैं बांस
कारोबारी नत्थू हुसैन के मुताबिक बरेली में उत्पादित बांस-बेंत से फर्नीचर नहीं बन पाता। इससे सिर्फ सीढ़ी और बल्लियां बनाने का ही कार्य होता है। इसलिए आसाम, त्रिपुरा से बांस का आयात किया जाता है। मिशन बैंबू के तहत अब नवाबगंज और फतेहगंज पश्चिमी के पास किसानों ने बांस की खेती की है। दो साल बाद वे बांस मिलने लगेंगे।
हैंडीक्राफ्ट मेले से बनी पहचान
कारोबारी नत्थू के मुताबिक शासन की ओर से देशभर में हैंडीक्राफ्ट मेले लगाए जा रहे हैं। बरेली के उद्यमी माल लेकर वहां पहुंचते हैं। कई बार वहीं माल बिक जाता है तो कभी नंबर लेकर बाद में ऑर्डर देते हैं।
इन इलाकों में तैयार हो रहे बांस-बेंत के उत्पाद
बरेली के पुराना शहर से लेकर सीबीगंज, पदारथपुर, ठिरिया, उड़ला जागीर, आलमपुर, गरगटा, फतेहगंज पश्चिमी, नवाबगंज के गांवों में बांस के उत्पाद बनाने का काम पीढ़ियों से हो रहा है। पदारथपुर में साइकिल के आगे लगने वाली बांस की टोकरी भी खूब बनाई जाती है। 90 फीसदी बास्केट केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि प्रदेशों को भेजी जाती हैं।



