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Bareilly News: चार साल की उम्र में पढ़ ली थी कुरान, सात में रखा पहला रोजा

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बरेली। बरेली जैसे छोटे शहर में रहकर आला हजरत ने जिस तरह पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई वह एक मिसाल है। दरगाह आला हजरत के प्रवक्ता नासिर कुरैशी ने बताया कि शहर-ए-बरेली की दुनिया भर में अलग पहचान कराने वाली शख्सियत आला हजरत इमाम अहमद रजा खान फाजिले बरेलवी की पैदाइश बरेली के मोहल्ला जसोली (अब जखीरा) में अपने वक्त के मशहूर मुफ्ती नकी अली खान के यहां 14 जून 1856 ईसवी यानी 10 शव्वाल 1272 हिजरी को हुई।

इन्हें बचपन से ही मजहबी माहौल मिला। नाम मोहम्मद अहमद रखा गया। वे बहुत से इल्म व फन के माहिर थे। 1860 ईसवी में मात्र चार साल की उम्र में कुरान का नाजरा कर लिया (पढ़ लिया था)। तकरीबन सात साल की उम्र में पहला रोजा रखा। यह सिलसिला दुनिया से कूच करने तक जारी रहा। आठ वर्ष की उम्र में ‘हिदायतुन्ह’ की किताब का अरबी में अनुवाद किया। 1869 ईसवी में मात्र 13 साल 4 माह 10 दिन में पहला फतवा मां के दूध के हवाले से लिखा। उसी दिन फतवानवीसी का आगाज किया, जो 1921 ईसवी तक जारी रहा। आज भी लोग सारी दुनिया में फतावा रजविया से फैज हासिल कर रहे है। यह मुसलमानों में खास मुकाम रखती है। इनकी विद्वता को इस वक्त के अरब व अजम के मशहूर उलेमा ने स्वीकार किया। इनकी शान में बेहतरीन शब्दों का प्रयोग किया। फतवों में नमाज, रोजा, जकात, हज, तहारत यानि पाकी का बयान, तलाक, निकाह, संपत्ति, बैंकिंग, फोनोग्राम में आवाज सुनने का शरई हुक्म, इल्म-ए-गैब, करेंसी नोट, राजनीतिक मसलों पर भी बेशुमार शरई फैसले, बीमा समेत लाखों फतवे लिखे, जिसका ताल्लुक आज की रोजमर्रा जिंदगी से है। मोहम्मद अहमद बड़े लेखक, शायर, मुफ्ती, मुहद्दिस, आलिम, हाफिज, भाषाविद, समाज सुधारक के साथ कुरान, हदीस, उसूले हदीस, फिकह, तफ्सीर, अकाइद भी थे। अपना उपनाम ”रजा” लिखते थे।


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