Bareilly News: जिनसे थी सहारे की आस, वही छोड़ गए उदास
बरेली। पितृ पक्ष शुरु हो गए हैं। शहर के लोग वृद्धाश्रम में रह रहे लोगों को खाने-पीने की वस्तुएं दान कर रहे हैं। पूर्वजों के नाम पर दान हो रहा है। यहां रह रहे बुजुर्ग इन लोगों में अपनों को तलाशते रहते हैं। उनका कहना है कि जिनसे सहारे की आस थी, वह ही उदास छोड़ गए। वह आंखों में आंसुओं का सैलाब लिए चेहरे पर झूठी मुस्कान बिखेरते रहते हैं। जरा देर उनके पास बैठकर बात करिए तो उनका दर्द छलक आता है।
बच्चा पैदा हुआ था तो पूरे मोहल्ले में खुशी मनाई थी। लड्डू बांटे, अंगुली पकड़कर चलना सिखाया। उन्हें बस इतनी सी ही आस रहती है कि बेटा बड़ा होकर उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगा। विडंबना है कि बच्चों के लिए तमाम कुर्बानियां देने और दुख सहने के बाद भी कई मां-बाप को बुढ़ापे में अपनी संतान से दुत्कार ही नसीब होती है। दुखद ये होता है कि जिसे वो अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा चाहते हैं, वहीं उन्हें वृद्धाश्रम की चौखट पर छोड़ देते हैं।
पति की मौत के बाद बेटे ने भी फेरा मुंह
बहेड़ी की केतकी देवी को उनके बेटे ने 80 साल की उम्र में घर से निकाल दिया, लेकिन मां का दिल है वह आज भी बेटे को दोष नहीं देती हैं। वह कहती हैं कि उनकी किस्मत की खराब है। पति श्याम चरण की मौत के बाद बेटे ने पहले गांव का मकान बेचा और करीब सौ बीघा जमीन अपने नाम करा ली। उसके बाद घर से निकाल दिया। वृद्धाश्रम में करीब नौ साल से हैं। उनके एक लड़का और दो बेटी है सभी की शादी कर दी। बेटियां मिलने आ जाती हैं। बेटा नौ साल पहले एक बार आया था। वह कहती हैं कि अब घर में जाने की इच्छा नहीं है।
बेटा समाजसेवी, पर मां उसे याद नहीं
शहर की राजेरानी प्रतिष्ठित परिवार से हैं। उनकी 88 साल उम्र है। पति लेखराज व्यापार करते थे और करीब 30 साल पहले उनकी मौत हो गई। बेटा मनमोहन तनेजा की शादी कर दी। एक पौत्र-पौत्री भी है। वह कहती हैं कि सब अच्छा चल रहा था, लेकिन मेरी छोटी बहन ही मेरी दुश्मन बन गई और उसने मेरे बेटे को मेरे खिलाफ भड़का दिया। रुंधे गले से कहती हैं कि मैं चल नहीं पाती हूं, आंखों से ठीक से दिखाई नहीं देता है। बेटा समाजसेवा करता है, लेकिन उसे मां याद नहीं है। बेटे ने नहीं समझा तो बहू क्या समझेगी।
बिक गया मकान, अब बेघर
बहेड़ी के 72 साल के रोशन लाल की दो बेटियां है। दोनों की शादी में खुद का मकान बेच दिया। दामाद नौकरी करते हैं, लेकिन शादी करने में घर से बेघर हो गए। पत्नी भी गुजर गई। भाइयों के सहारे रह रहे थे, लेकिन बहु को पसंद नहीं था। इस कारण भाई उन्हें वृद्धाश्रम छोड़कर चले गए। चार भाइयों में वह सबसे बड़े है। भाइयों का ज्वैलर्स का काम है। सभी संपन्न है। वृद्धाश्रम में रहते हुए तीन महीने हो गए है।
भूपेंद्र को नौकरों की तरह रखती थी भाभी
50 साल के भूपेंद्र कौर अविवाहित है। भाई व्यापारी हैं, उन्हीं के पास रह रहे थे। भाभी नौकरों की तरह व्यवहार करती थी। रोजाना मारती थी और भाई भी नहीं बचाते थे। एक दिन भाभी वृद्धाश्रम के बाहर दरवाजे पर छोड़कर चली गई थी। अब पांच साल से यही मेरा परिवार है। कम से कम यहां मार तो नहीं पड़ती है। यहां पर रह रहे लोग आपस में एक-दूसरे के दर्द को बांट लेते है।
छोटे भाई की खातिर नहीं की शादी
शाहजहांपुर के गिरीश चंद्र पाठक की उम्र 74 साल है। पांच साल से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। उनके पांच छोटे भाई हैं, सभी को पढ़ा लिखाकर काबिल बनाना था तो उन्होंने खुद की शादी न करने का फैसला किया। 50 बीघा खेत था। किसी भाई को काम नहीं करने दिया। सभी को पढ़ाया। एक को सरकारी शिक्षक बनाया। दो की प्राइवेट नौकरी में हैं और दो भाई खेती करते हैं। मैंने पांच को मिलकर पाला, लेकिन यह पांचों मिलकर मुझे रोटी नहीं दे सके। खुद एक निजी स्कूल में नौकरी शुरु की तो वहां पानी के टैंक की सफाई करते हुए एसिड से आंखों की रोशनी चली गई।
गोपाल कृष्ण अग्रवाल बने सहारा
शहर के गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने हार्टमैन पुल के पास वृद्धाश्रम बनाया। यहां इस समय 14 लोग रह रहे हैं। यह सभी का खर्चा उठाते हैं। वह कहते हैं कि मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे इन लोगों की सेवा करने का अवसर ईश्वर ने दिया है।



