Budaun News: भविष्य के खिलाड़ी तैयार कर रहे परवेज गाजी

06 बीडीएन-05-परवेज गाजी।
बदायूं। मंजिल के मंजर पर हिम्मत की हुकूमत चलती है, हिम्मत चाहिए बड़ा सोचने के लिए। जिस दिन सोच लिया समझ लो कर दिया। यह बात शहर के परवेज गाजी पर सटीक बैठती है। मध्यम परिवर से होने के बाद बावजूद भी उस दौर में एथलेटिक्स में अपना और बदायूं का नाम रोशन किया, जब लोग बच्चों को घर से निकलने तक नहीं देते थे।
शहर के मोहल्ला नाहरखां निवासी परवेज गाजी की उम्र अब लगभग 62 साल की है। उन्होंने बचपन से खेलों का काफी शौक था। तब उनके पिता अंसार हुसैन ने उनका पंजीकरण जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम में कराया गया। वह रोजाना वहां पर प्रैक्टिस के लिए जाते थे। उस दौर में बेहद ही कम लोगों को परिवार के लोग खेलने के लिए मनोबल बढ़ाते थे। तब वह कक्षा नौ में पढ़ रहे थे। अपने अच्छे खेल के बल पर उनका एडमिशन लखनऊ के स्पोर्ट्स कॉलेज में हो गया। परिवार वालों ने उनकी दिलचस्पी को देखते हुए उनको स्पोर्ट्स कॉलेज भेज दिया। इसके बाद में परवेज गाजी ने कभी पलटकर नहीं देखा और कदम आगे बढ़ते चल गए। उन्होंने 1978 में नेशनल एथलेटिक्स ओपन गेम में प्रतिभाग किया। यहां पर उन्होंने सौ मीटर, दो सौ मीटर दौड़ व चार सौ मीटर रिले रेस में प्रतिभाग किया। यहां उन्होंने सौ मीटर व चार सौ मीटर रिले रेस में कांस्य मेडल और दो सौ मीटर में सिल्वर मेडल प्राप्त कर जिले का नाम रोशन किया था। इसके अलावा भी उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में भाग लेकर पदक जीते।
जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम में बतौर कोच युवाओं को दी ट्रेनिंग
– स्पोर्ट्स कॉलेज छोड़ने के बाद में परवेज गाजी का जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम में बतौर कोच 2006 से 2012 तक का सफर रहा। इस दौरान उन्होंने युवाओं को एथलेटिक्स की तरफ आगे बढ़ाया और उनको बेहतरीन ट्रेनिंग दी। अब भी वह लगातार युवाओं को न केवल प्रशिक्षित कर रहे हैं बल्कि उनकी हौसलाफजाई भी कर रहे हैं।
यह है अभी की दिक्कतें
– परवेज गाजी के अनुवार, शासन ने जिले में तैयारी करने वाले युवाओं के लिए केवल स्टेडियम बनाकर दे दिया, लेकिन वह इस मुकाम को कैसे हासिल करेंगे। उनके पास न तो कोच है और न ही संतुलित आहार ऐसे में अधिकांश युवा जिले में अटककर रह जाते हैं। एथलेटिक्स खिलाड़ियों के लिए एक और बड़ी बाधा हैं कि यहां पर वे मिट्टी के ट्रैक पर अपनी पूरी तैयारी करते हैं। अगर उनका चयन नेशनल लेवल की प्रतियोगिता में होता है, तो वहां पर उनको सिंथेटिक ट्रैक पर दौड़ लगानी पड़ती है। इससे उनकी तैयारी पर असर पड़ता है।
-खिलाड़ियों को बेहतर सुविधा मिले, इसको लेकर प्रयासरत है। कोच की कमी है, इसको लेकर उच्चाधिकारियों को अवगत करा दिया गया है। -अमित रिछाड़िया, जिला क्रीड़ा अधिकारी