डी-डॉलराइजेशन: क्यों डी-डॉलराइजेशन की तरफ बढ़ रही दुनिया, क्या रिजर्व रिजर्व में नए-नए शेयर?
क्या रुपया रिजर्व करेंसी बन जाएगा: क्या भारत की पहली रिजर्व बैंक का दर्जा हासिल कर सकते हैं? इन दिनों से ये सवाल बड़े ही जोर के साथ उठाया जा रहा है। देस दुनिया के कई जानकारियों का मानना है कि अमेरिकी डॉलर के अलावा दुनिया में एक और किसी को आरक्षित मुद्रा का सेवन दिया जाना चाहिए जिससे अमेरिकी डॉलर के दबदबे को चुनौती दी जा सकती है। साथ ही नॉस्ट्रो अकाउंट पर भी इसी का कंट्रोल है।
क्या रिजर्व बना रहेगा?
हाल ही में कोटक महिंदा बैंक के जिम्मेदार उदय कोटक ने कहा था कि भारतीय रिजर्व बैंक का दर्जा हासिल करने में सबसे आगे है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय देश यूरो को रिजर्व नहीं बनाया जा सकता क्योंकि यूरोप विदेशी है। यूके और जापान की अब वो हैसियत नहीं है कि पाउंड और येन को आरक्षित करें। चीन पूरी दुनिया पर भरोसा नहीं करता है इसलिए युआन रिजर्व करेंसी नहीं बन सकता है। ऐसे में भारतीय रुपया रिजर्व बनने के लिए सबसे प्रिन्ट हो सकता है।
एम्बिट एसेट स्टेटमेंट के अनुसार 2020 तक वैश्विक व्यापार में चीन की गिरावट 15 प्रतिशत है, लेकिन भरोसे की कमी और चीन की आर्थिक प्रणाली के कारण विश्व के विदेशी मुद्रा भंडार में यह 3 फीसदी से भी कम है। जबकि भारतीय अर्थशास्रता को चीन के मामले में नियामकों के अल्प भरोसे मंदिर और स्थिरता के कारण बेहतर स्थिति है। अगर अगले कुछ दशकों में भारत एक आर्थिक महाशक्ति बन सकता है और वैश्विक व्यापार में इसकी रेटिंग बढ़ती जा रही है तो डॉलर की जगह रुपये को डॉलर के विकल्प के रूप में बयानता निश्चित रूप से बढ़ेगी।
डी-डॉलराइजेशन क्या है?
अमेरिकी रिजर्व बैंक मुद्रा के तौर पर डॉलर के दस्तावेजों पर डी-डॉलराइजेशन का दावा करता है। जिसे अलग-अलग देश ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल करते हैं। स्ट्रेट ऑइल से लेकर दिग्भ्रमित, अपने विदेशी मुद्रा भंडार को भरने के लिए करोड़ों की कमाई के साथ रोज़गार व्यापार के लिए भी डॉलर का उपयोग किया जाता है। 1920 में डॉलर ने रिजर्व मुद्रा के तौर पर पाउंड स्टर्लिंग की जगह ली थी। जापान और चीन लगातार डी-डॉलराइजेशन की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं।
डी-डॉलराइजेशन की बात क्यों हो रही है
वैश्विक तनाव, व्यापार युद्ध, आर्थिक व्यवस्था ऐसे प्रमुख कारण हैं जिसके कारण दुनिया में डी-डॉलरीकरण को लेकर बहस चल रही है। इसका रूस करार कर रहा है चीन, ईरान, लैटिन अमेरिकी देश रूस के साथ दे रहे हैं। रूस ने 80 बिलियन डॉलर लोड किया है। अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को इन दिनों एक के बाद एक तगड़ा झटका लग रहा है। रूस और चीन के सेंट्रल बैंक अब कम डॉलर में विदेशी मुद्रा भंडार रखते हैं और युआन में लेन-देन कर रहे हैं। रूस और चीन को लगता है कि अमेरिका और उसकी शक्तियों पर डॉलर को सबसे बड़ी चुनौती दी जा सकती है और अमेरिका की आर्थिक ताकतों पर चोट लग सकती है।
हाल ही में सऊदी अरब ने चीन को तेल बेचने पर चीन के तौर पर युआन को स्वीकार करने की मंजूरी दी है। साथ ही स्टार्स तेल के डैम का निर्माण भी युआन में किया जाएगा जो अब तक डॉलर में हो रहा है। भारत भी दूसरे के जरिए रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है। लैटिन अमेरिकी देश अर्जेटीना ने भी फैसला किया है कि चीन के लिए जाने वाले आयात के लिए वो चीनी मुद्रा में भुगतान करेगा। ये सब चीनी करें सी वार्षिकी को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। पर कटौती ये है कि ज्यादातर देश चीन के विस्तारवादी हैं और अल्पांश के अभाव के कारण उन पर कोई गारंटी नहीं है।
डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती
डॉलर को ऐसे ही झटका लग रहा है तो अमेरिका के इतिहास में उसे लपकने वाला ये सबसे बड़ा झटका होगा क्योंकि डॉलर को पूरी दुनिया के खिलाफ अपने सबसे बड़े हथियार के रूप में अमेरिका इस्तेमाल करता है। दुनिया के 20 पहलू यानी उत्पादन पर अमेरिका का कब्जा है। ग्लोबल सेंट्रल सेक्शंस में 60 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर है। डॉलर अमेरिका उसे वैश्विक राजनीति और आर्थिक पटल पर सबसे बड़ी ताकतें प्रदान करता है।
एम्बिट एसेट के मुताबिक डी-डॉलराइजेशन के बाद जो भी रिजर्व बैंक में रहता है उसके पैसे के बराबर नहीं होगा। लेकिन कई देशों वाले अपने रिजर्व में निश्चित रूप से हो सकते हैं जैसे ब्रिक्स, क्वाड या फिर खाड़ी के देश यूरो के समान अपनी एक बना लें।
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