बदायूं

मेला ककोड़ा : संसाधन और सुविधाएं बढ़ीं पर घट गई कल्पवास की अवधि

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Fair Kakoda: Resources and facilities increased but duration of Kalpavas decreased

मेला ककोड़ा में गस्त करती पुलिस। संवाद

कादरचौक। जैसे-जैसे संसाधन और सुविधाएं बढ़ती गईं वैसे-वैसे लोगों की जिंदगी में भागमभाग बढ़ गई। उनके पास समय कम होता गया। कभी बैलगाड़ियों से परिवार के साथ मेले में जाकर लोग कई-कई दिन कल्पवास करने वाले अब कार और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से जाकर दिन के दिन लौटने लगे हैं। ऐसे में ककोड़ा मेला में कल्पवास का समय घटता गया। आधुनिकता ने ग्रामीण परिवेश के प्रति लगाव भी कम किया है। मेला में कल्पवासियों के घटने की एक वजह यह भी है।

रुहेलखंड क्षेत्र का मिनी कुंभ कहे जाने वाले मेला ककोड़ा की चमक-दमक भले ही साल दर साल बढ़ रही हो, लेकिन परंपराएं टूटती जा रही हैं। एक समय था जब लोग बैलगाड़ियों में सवार होकर परिवार के साथ मेला देखने जाते थे। रात भर सफर करके लोग तड़के मेले में पहुंचते थे। रोशनी के लिए बैलगाड़ी के आगे लालटेन जलाकर लटका ली जाती थीं। रास्ते भर महिलाएं ढोलक पर भजन गाती रहती थीं। इसके बाद कई-कई दिन तक मेले में प्रवास कर गंगा स्नान करते थे। लौटते वक्त मेले से घर-गृहस्थी के लिए सामान खरीदते थे।

जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी की दूरी बैलगाड़ी से तय करने में करीब पांच से छह घंटे लग जाते थे तो लोग वहां छह-सात दिन रुकते थे और परिवार के साथ मेले का आनंद लेते थे। पहले संयुक्त परिवार होने के कारण लोगों को घर की सुरक्षा की चिंता भी नहीं रहती थी। ऐसे में लोग निश्चिंत होकर कई-कई दिनों तक गंगातट पर मेले में परिवार के साथ समय गुजारते थे।

जैसे-जैसे सुविधाएं और संसाधन बढ़े वैसे-वैसे लोगों पर काम का दबाव भी बढ़ा। संयुक्त परिवार भी एकल परिवारों में तब्दील हो गए। घर-घर कार होने और आधुनिकीकरण हावी होने के कारण अब लोग कार से एक घंटे में मेला पहुंचकर गंगा स्नान करके शाम को घर लौट आते हैं। मॉल संस्कृति और ऑनलाइन खरीदारी की बढ़ती प्रवृत्ति ने मेले से खरीदारी को भी प्रभावित किया है।

ग्रामीणों की आय भी हुई प्रभावित

मेले से हर वर्ग के ग्रामीणों की आय में इजाफा होता था। उस दौर में मेले में बिकने वाली वस्तुएं तब बाजारों में सहज उपलब्ध नहीं हुआ करती थीं। दूर-दराज के हस्तशिल्पियों की बनाई चीजें उन्हें खूब लुभातीं। मिट्टी के बर्तन हों या पत्थरों की चाकी और सिलबट्टे, वे इनकी खूब खरीदारी करते। अब इनकी जगह बिजली चालित उपकरणों ने ले ली है। वहीं अब मेले में मनोरंजन के साधन भी काफी कम हो गए हैं। पहले मेले में नखासा, घुड़दौड़, हाथी दौड़, नौटंकी, नाव की सजावट जैसे कई आयोजन हाेते थे, जो धीरे-धीरे बंद होते गए।

दुकानदारों को सुविधा के नाम पर कुछ नहीं

कादरचौक। ककोड़ा मेले में तंबू लगाने के लिए जमीन का समतलीकरण सिर्फ माननीयों और अधिकारियों के लिए कराया जाता है। दुकानदारों को दुकान लगाने के लिए स्वयं समतलीकरण कराना पड रहा है। मेले के अंदर की सडकों का हाल यह है कि बुधवार को पानी का छिड़काव करने जो टैंकर गया, वही मिट्टी में फंस गया।

मेला ककोड़ा का औपचारिक शुभारंभ सोमवार को झंडी स्थापना के साथ हो चुका है। संत-महात्माओं के साथ दुकानदारों का पहुंचना शुरू हो गया है। मीना बाजार में काम तेजी से चल रहा है। दूरदराज से आए दुकानदार दुकानें सजाने में लगे हैं। 27 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा का मुख्य स्नान है। हेड गोताखोर मुसाकिर के नेतृत्व में स्नान घाटों पर 30 गोताखोरों के अलावा गंगा में 40 नावों की तैनाती भी की गई है। नाव भी ककोड़ा पहुंचने लगी हैं। मेले में फ्लड पीएसी के 35 जवान पहुंच गए हैं।

आठ वाॅच टावरों से भी रखी जाएगी नजर

गंगातट पर नजर रखने के लिए 25-25 फुट ऊंचे आठ वाच टावर बनाए जा रहे हैं। यहां से पुलिस मेलास्थल की 24 घंटे निगरानी करेगी। वीआईवी क्षेत्र में भी वाॅच टावर बनाए जा रहे हैं। मुख्य स्नान घाट के आसपास वाॅच टावरों की संख्या अधिक रहेगी। मेले में पहली बार फूड सेफ्टी वैन की तैनाती की जाएगी। वैन के साथ लखनऊ और बदायूं की खाद्य सुरक्षा औषधि प्रशासन टीम तैनात रहेगी। फूट सेफ्टी वैन के 26 नवंबर को पहुंचने की उम्मीद है।

बस स्टैंड के लिए अभी नहीं मिली जमीन

मेलास्थल पर अस्थायी रोडवेज बस स्टैंड के लिए अब तक जमीन चिह्नित नहीं हुई है। इसके लिए बदायूं डिपो प्रशासन ने जिला पंचायत से संपर्क भी किया है। बदायूं डिपो ने मेला के लिए 40 बसें लगाई हैं। आठ बसें शटल सेवा में रहेंगी। अस्थायी बस स्टैंड पर तैनाती के लिए रोडवेज स्टाफ का चयन हो गया है।

गंगा तट पर सजने लगे साधु-संतों के आश्रम

गंगा तट पर साधु-संतों के आश्रम सजने लगे हैं। दूरदराज से संत-महात्मा गंगा तट पर कल्पवास करने को पहुंचने लगे हैं। 23 नवंबर को देवोत्थान एकादशी के साथ कल्पवास करने पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी काफी बढ़ जाएगी। इन दिनों 24 घंटे डेरा-तंबू लगाने का काम चल रहा है। मुख्य स्नान घाट समेत आसपास साधु-संत भी अपने आश्रम बनाने में लगे हुए हैं।

मेला ककोड़ा में गस्त करती पुलिस। संवाद

मेला ककोड़ा में गस्त करती पुलिस। संवाद

मेला ककोड़ा में गस्त करती पुलिस। संवाद

मेला ककोड़ा में गस्त करती पुलिस। संवाद

मेला ककोड़ा में गस्त करती पुलिस। संवाद

मेला ककोड़ा में गस्त करती पुलिस। संवाद


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