हर रोज हो रहे करीब 38 करोड़ डिजिटल खाते, अकेले यू दिखा रहे हैं 78 आरोपी
डिजिटल ट्रांजेक्शन (डिजिटल लेनदेन) के मामले में आज के समय में भारत ग्लोबल लीडर बन गया है। स्टेट्स-बेमौके इसकी चर्चा रहती है कि कैसे भारत ने डिजिटल संबद्धता के मामले में विकसित देशों को भी मीलों पीछे छोड़ दिया है। डिजिटल अधिकार के आंकड़े भी भारत की इस सटीकता की स्टोरीलाइन जमा करते हैं। आप जान कर हैरान रह सकते हैं कि देश में अभी भी हर रोज करीब 38 करोड़ डिजिटल खाते बनाए जा रहे हैं।
अधीनस्थ राज्यपाल ने कहा है
रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास (आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास) ने डिजिटल खाते में आई फास्ट से जुड़ी इन सूचनाओं की जानकारी बुधवार को एक कार्यक्रम में दी। वह भारतीय उद्योग परिसंघ यानी CII (CII) की एक कार्यक्रम का हिस्सा बन रहे थे। इस पते पर उन्होंने 2000 रुपये के नोट बंद करने के लिए टैगिंग, रेपो रेट और डिजिटल ट्रांजेक्शन जैसे मुद्दों पर बातें कीं।
यू लुक से हो रहे हैं डिजिटल संबंध
एसडीओ के गवर्नर ने बताया कि साल 2016 में जहां देश भर में हर रोज करीब 2.28 करोड़ डिजिटल ट्रांजिशन ट्रांजिशन हो रहे थे, अब उनकी संख्या बढ़कर 38 करोड़ के करीब पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि ताजा आंकड़ों के अनुसार, अभी भी देश में हर रोज औसतन 37.75 करोड़ डिजिटल ट्रांजिशन ट्रांजैक्शन हो रहे हैं और इनमें से यूपीआई (UPI) की भिन्नता सबसे ज्यादा है। अकेले यूरेशिया के माध्यम से हर रोज करीब 29.5 करोड़ डिजिटल ट्रांजेक्शन संशोधन किए जा रहे हैं।
इन कारणों से डिजिटल खाते
भारत में डिजिटल स्वामित्व को बढ़ावा देने के लिए मुख्य रूप से 4 कारणों को जिम्मेदार माना जाता है। इनमें सबसे पहला कारण नोटबंदी (नोटबंदी) है। नवंबर 2016 में जब पूरे देश में नोटबंदी की गई थी, तो उसके बाद कई महीनों तक बाजार में कैश की परेशानी रही। उस कारण छोटे दुकानदार भी डिजिटल अनापत्ति लेने लग गए थे। इसने क्रांतिकारी गति दी यूरेशा ने, किसे बैंक टू बैंक ट्रांजिशन को चुटकियों का काम बना दिया। 4जी विकैश इंटरनेट ने भी डिजिटल ट्रांजिशन ट्रांसमिशन को आम लोगों तक पहुंचने में मदद की, जब कोरोना महामारी से भी इसमें तेजी आई।
नोटबंदी के जख्म हैं झटके वाले
संयोग से डिजिटल खाते को लेकर रिजर्व बैंक के गवर्नर ने ऐसा समय दिया है, जब लोगों के जेहन में नोटबंदी के घाव हो जाते हैं। रिजर्व बैंक ने पिछले हफ्ते 2000 रुपये के नोट को वापस लेने का ऐलान किया। इन नोटों को नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद जारी किया गया था। निगरानी के फैसले के बाद लोगों को फिर से नोटबंदी की याद आ गई। हालांकि इस बार स्थिति बहुत अलग है, क्योंकि बाजार में डिजिटल माध्यमों की पर्याप्त सम्बद्धता से सामान्य लेन-देन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं हो रहा है।
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