Shahjahanpur News: सरोद की धुन के चलते बसा है बंगला सरोदी

डॉ.विकास खुराना। विश्व संगीत वाली खबर।
शाहजहांपुर। विश्व संगीत दिवस बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिवस पर शाहजहांपुर के सरोद घराने की बात होना बेहद जरूरी है। शहर के प्रख्यात भवन सरोदी बंगले से निकली सरोद के सुर आज विश्वभर में संगीत फैला रहे हैं। सरोद के नाम पर ही सरोदी बंगला मोहल्ला भी यहां पर है।
अफगानिस्तान के बंगश पठानों से यहां 16वीं सदी के मध्य ही सरोद यहां आया था। 1810 में जन्मे उस्ताद मुराद अली खान ग्वालियर से यहां आए थे। मुराद अली तानसेन के वंशजों से संगीत की शिक्षा हासिल कर चुके थे। एसएस कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि शाहजहांपुर में पूर्व में प्रसिद्ध सरोदवादक उस्ताद नज्जफ अली खान का परिवार बस चुका था।
उनके पौत्र इनायत अली खान भी सरोद के बड़े वादक थे। जब उस्ताद मंसूर अली खान आए तो उन्होंने इस परिवार में केवल एक मात्र पुत्र अब्दुल्ला खान को पाया। उन्होंने अब्दुल्ला खान को गोद ले लिया और सरोद की शिक्षा दी। उसे लेकर दरभंगा के महाराजा के दरबार में चले गए। उस्ताद अब्दुल्ला खान ने सरोद में नई तकनीकों का अविष्कार कर उसे आधुनिक स्वरूप दिया, जिससे यह भारतीय रागों और गायन में भी प्रयुक्त होने लगा।
डॉ. विकास के अनुसार, वह बंगाल स्थित गौरीपुर के राजा के दरबार तक पहुंचे। उनके बेटे उस्ताद अमीर अली खान ने बंगाल के शाही परिवार के वीरेंद्र किशोर मोइत्री व ललिता मोहन मोइत्री को सरोद में दीक्षित किया। प्रसिद्ध सरोद वादक राधिका मोहन मोइत्री, ललिता मोहन के ही वंश के हैं। इस समय तक सरोद और भी परिष्कृत हो गया था और इसके नौ प्रकार बन चुके थे।
फोटो नंबर 28
सरोद को आगे बढ़ा रहे शाहजहांपुर के प्रभात कुमार
आवास विकास कॉलोनी में जन्मे प्रभात कुमार सरोद को आगे बढ़ा रहे हैं। पंडित प्रभात कुमार को नई पीढ़ी के बीच देश के सबसे उत्कृष्ट सरोद वादकों में एक माना जाता है। उन्हें बचपन से विश्वविख्यात सरोद वादिका पदम भूषण शरन रानी से सरोद सीखा। वह सेनिया मैहर घराने से ताल्लुक रखते हैं। प्रभात कुमार ने बताया कि उनके पिता कैलाश चंद्र सक्सेना एसपी कॉलेज में प्रधानाचार्य थे। उनका भी संगीत से काफी लगाव था। उनकी बहन डॉ.नमिता सक्सेना कटिया टोला में संगीत विद्यालय चलाती हैं।
सरोद भारत में रकाब के परिष्कृत स्वरूप के रूप भारत में 16वीं सदी के मध्य आया था, किंतु अनेक इतिहासकार इसकी उत्पत्ति भारत की चित्रा वीणा से बताते है, जो ईसा के दो सौ वर्ष पूर्व से अस्तित्व में थी। शाहजहांपुर में सरोद की आमद का समय निर्धारित किया जाए तो यह उस्ताद नज्जफ अली के समय का है, जो शाहजहांपुर में बंगश पठानों की आमद का प्रारंभिक चरण है।
– डॉ. विकास खुराना, इतिहासकार

डॉ.विकास खुराना। विश्व संगीत वाली खबर।