Bareilly News: सहूलियतों की दरकार पूरी हो तो आए उद्योगों की बहार
बरेली। कांच-लाख की चूड़ी, चारपाई बुनाई, सोने-चांदी के धागे और सुरमा कारोबार से शुरू उद्योगों के सफर में उद्यमी बरेली को उद्योग नगरी के तौर पर पहचान दिलाने में जुटे हैं। उद्योग स्थापना के लिए भूमि की उपलब्धता, विभागों की एनओसी, बिजली आपूर्ति समेत कई मानक अड़चन बन रहे हैं। उद्यमियों ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (एमएसएमई) दिवस पर सरकार से सहूलियत की मांग की है।
उद्यमियों के मुताबिक जिले में परसाखेड़ा और भोजीपुरा दो औद्योगिक आस्थान हैं। रजऊ परसपुर को भी औद्योगिक आस्थान घोषित किए जाने की मांग उठ रही है। अब तक सहमति नहीं बनी है। बरेली विकास प्राधिकरण के सख्त मानकों के चलते स्थापना के लिए प्रस्तावित नए उद्योग धरातल पर नहीं उतर रहे हैं। जमीन की खरीद से दोगुना दर पर डेवलपमेंट चार्ज, स्थापित किए जा रहे उद्योग के सामने 12 मीटर चौड़ी सड़क होना, बाउंड्री की ऊंचाई पांच फीट से ज्यादा न होना, उद्योग में अग्निशमन के लिए क्षमतानुसार 50 हजार से एक लाख लीटर क्षमता का टैंक बनवाना, पीपीपी मॉडल पर औद्योगिक पार्क बनाने के लिए कम से कम दस एकड़ भूमि की उपलब्धता, सुचारु बिजली आपूर्ति, भूगर्भ जल दोहन के लिए पंजीकरण की अनिवार्यता समेत अन्य कई नियम बरेली को उद्योग नगरी बनाने में बाधा बन रहे हैं।
दावा : पंजीकृत 39,716 उद्याेगों से ढाई लाख परिवार के पास रोजगार
जिला उद्योग एवं प्रोत्साहन केंद्र के मुताबिक, जिले में अब तक 39,716 उद्योग पोर्टल पर पंजीकृत हो चुके हैं। इनके जरिये अनुमानित करीब ढाई लाख परिवारों को रोजगार मिलने का दावा है। हालांकि, इनमें 100 करोड़ के टर्नओवर वाले 100 और 50 करोड़ के टर्नओवर वाले करीब 200 उद्योग हैं। 10 करोड़ से ज्यादा के 300 और एक करोड़ से अधिक के टर्नओवर वाले एक हजार उद्योग होने का अनुमान है। इसमें परसाखेड़ा, भोजीपुरा, सीबीगंज, रजऊ परसपुर, रिछा, आंवला और शहर के आसपास स्थापित उद्योग शामिल हैं।
विदेश तक थी उत्पादों की धमक, फिर पड़ी बंदी की मार
उद्यमियों के मुताबिक, वर्ष 1919 में कत्था फैक्टरी से उद्योग स्थापना की शुरुआत हुई। 1924 में इंडियन वुड टर्पेंटाइन एंड रेजिन (आईटीआर) फैक्टरी, 1932 में नेकपुर में एचआर शुगर फैक्टरी, 1938 में वेस्टर्न इंडियन मैच कंपनी (विमको), 1960 में फतेहगंज पश्चिमी में रबर फैक्टरी स्थापित हुई। इन कंपनियों के उत्पादों की विदेश तक में धमक थी। फिर एक दौर आया जब हजारों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया बनीं ये फैक्टरियां बंद होने लगीं। 1998 में आईटीआर, 1999 में रबर फैक्टरी, 1998 में नेकपुर शुगर फैक्टरी, 2014 में विमको, 2010 में यूपी सहकारी कताई मिल बंद हो गई। हजारों कर्मचारी बेरोजगार हो गए। बताते हैं कि कइयों ने मानसिक तनाव के चलते दम तोड़ दिया।
फोटो : उद्यमियों से बातचीत
सरकार उद्योगों को बढ़ावा दे रही है, पर कई ऐसे नियम हैं जो अड़चन बन रहे हैं। समस्याओं का समाधान नहीं होगा तो जो उद्योग चल रहे हैं, भविष्य में उनके सामने भी चुनौती रहेगी। – सुरेश सुंदरानी, वरिष्ठ उद्यमी
युवा अब नौकरी के बजाय उद्योग स्थापना के लिए आगे आ रहे हैं। मगर विभिन्न विभागों के नियम उनकी राह में बाधा हैं। सरकार को उनकी समस्याओं का समाधान करना होगा। – तनुज भसीन, चेयरमैन, आईआईए
इन्वेस्टर्स समिट के कई निवेशकों के प्रोजेक्ट धरातल पर नहीं उतर पा रहे। वजह विभागों की एनओसी, एनजीटी के नियम, लैंड यूज चेंज आदि शामिल हैं। इनका समाधान हो। – राजेश गुप्ता, अध्यक्ष, चैंबर ऑफ कॉमर्स



