Bareilly News: विशेष बच्चों की आशा पूरी करने को सीखी इशारों की भाषा
बरेली। इशारों की भाषा में ही विशेष बच्चों की आस छिपी होती है। स्कूलों में कुछ ऐसे बच्चों ने दाखिला लिया तो शिक्षकों के सामने संकट खड़ा हुआ। बच्चों की आस पूरी करने के लिए उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया। पहले खुद सांकेतिक भाषा का पाठ पढ़ा, अब बच्चों को सिखा रहे हैं। वे बच्चों को बेहतर समझते भी हैं। शिक्षकों ने इसे अपने जीवन का बेहतर अनुभव बताया। कहा कि उन्हें विशेष बच्चों के लिए काम करना अच्छा लग रहा है। विश्व सांकेतिक भाषा दिवस पर हम कुछ ऐसे ही शिक्षकों से आपको मिलवा रहे हैं। संवाद
खेमलता ने कायम की मिसाल
केस-1
महानगर की खेमलता जूनियर हाईस्कूल तकराकला में शिक्षिका हैं। वह दो साल से विशेष बच्चों के लिए काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि दो साल पहले स्कूल में एक ऐसी छात्रा ने दाखिला लिया। उसे काफी समस्याएं थीं, लेकिन रचनात्मकता कूट-कूटकर भरी थी। मैं खुद भी चाहती थी कि यह कमजोरी उसकी सफलता में आड़े न आए। इसलिए मैंने उसे इशारों से अपनी बात समझाना शुरू किया और उसकी बात को समझना। शुरुआती दौर में कठिनाई हुई। इसके बाद हमारा एक अलग ही रिश्ता कायम हो गया।
दो साल से कायम है इशारों का रिश्ता
केस- 2
कंपोजिट विद्यालय मनकरा बहेड़ी के शिक्षक मनोज कुमार दो साल से ऐसे बच्चों के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले उन्हें सांकेतिक भाषा का ज्ञान नहीं था। दो साल पहले विद्यालय में ऐसे एक छात्र का दाखिला हुआ। वह चुपचाप कोने में बैठा रहता था। उसे सामान्य भाषा में कही बात समझने में कठिनाई होती थी। कुछ वक्त बाद हमें बच्चे की परेशानी का पता चला तो यूट्यूब से ऐसे बच्चों को समझाने के तरीकों के बारे में जानने का प्रयास किया। अब मैं उसे पढ़ा पा रहा हूं।
दूसरों का सपना जी रहीं सपना
केस-3
प्राथमिक विद्यालय बछेरा में तैनात शिक्षिका सपना सिंह सात साल से विशेष बच्चों के सपनों को जी रही हैं। उन्होंने बताया कि करीब सात साल पहले एक ऐसी बच्ची का दाखिला हुआ। उसमें आंखों के जरिये अपनी बात कहने और समझने की अलग क्षमता थी। हालांकि उसे अपनी बात कहने में दिक्कत होती थी। इसमें सोशल मीडिया से हमें काफी मदद मिली। मैंने पहले उस बच्ची को समझाने के तरीके सीखे। इसके बाद वह अन्य तरह से दिए गए संकेतों की भाषा भी समझने लगी। यहीं से हमें ऐसे बच्चों को समझने का मौका मिला।



