Bareilly News: बच्चों को समझने के लिए अभिभावकों को बनना पड़ता है दोस्त
बरेली। एक बच्चे की सफलता में अभिभावक सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ होते हैं। उनकी परवरिश ही व्यक्ति को जीवन जीने का तरीका सिखाती है लेकिन आजकल के बदलते दौर में अभिभावकों के सामने बच्चों को समझने की चुनौतियां बढ़ गई हैं। इस वजह से अभिभावकों ने परवरिश का तरीका भी बदल दिया है। वह बच्चों के दोस्त बनकर उनके साथ चलने का प्रयास कर रहे हैं।
बच्चों पर सबसे बेहतर बनने की इच्छा से बढ़ता दबाव नए दौर के अभिभावकों की सबसे बड़ी समस्या है। शिक्षा, खेल यहां तक की रहने के तौर-तरीकों में भी बच्चों में एक होड़ लगी है। बच्चे इतनी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं कि उनकी गति को मिला पाना माता-पिता के लिए एक चुनौती है। मोबाइल फोन से मिली आजादी से बच्चे जितने एडवांस हो रहे हैं, उतना ही सुरक्षा के मद्देनजर अभिभावकों की चिंताएं बढ़ रही हैं। मगर इन्हीं समस्याओं के बीच मॉडर्न पेरेंटिंग के जरिये अभिभावक इन समस्याओं का भी हल ढूंढ़ लिया है। उनके अनुसार आधुनिकता की मदद से वह बच्चों के महत्वाकांक्षाओं को समझ पा रहे है। बच्चों को सही-गलत का फर्क सीखा पा रहे हैं।
क्या हैं चुनौतियां
प्रतिस्पर्धा की वजह से से बच्चों पर बढ़ता दबाव
अवसर बढ़ने से बढ़ता असमंजस
औरों की देखा-देखी आधुनिक व महंगी वस्तुओं का मोह
घर से बाहर जाने की जिद
मोबाइल फोन से मिली आजादी से सुरक्षा का खतरा
क्या है मॉडर्न पेरेंटिंग
मॉडर्न पेरेंटिंग एक प्रक्रिया है, जिसमें अभिभावक नए दौर के तरीकों का इस्तेमाल कर बच्चों की परवरिश करते हैं। इसमें में वह दूर से ही बच्चों की हर एक गतिविधि को परखते हैं। इसमें अभिभावक बच्चों को डाटने और रोकने के बजाय उनको समझने पर फोकस करते हैं। वह फोन के इस्तेमाल से बच्चों की आदतों में हो रहे बदलाव और उनकी समस्याओं पर गौर करते हैं।
शारीरिक के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना चुनौती
अभिभावक रीता मंडल बताती हैं कि बच्चों पर खेल, शिक्षा और अन्य गतिविधियों में उत्तीर्ण होने का दबाव है। इसी कारण हमें शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना पड़ रहा है। हम समय-समय पर बच्चों से बात कर उनकी समस्याओं और लाइफ स्टाइल के बारे में जानने की कोशिश करते हैं और कुछ समय बच्चों को अकेले भी छोड़ते हैं।
बच्चों की पसंद के अनुसार ढूंढते हैं करियर की राह
अभिभावक करुणा कुमार कहती हैं कि अवसर बढ़ने से बच्चे असमंजस में रहते हैं। नए दौर में अभिभावक बच्चों के करियर का फैसला अकेले नहीं ले सकते। उनकी पसंद और नापसंद के मद्देनजर उनके साथ ही करियर की राह तलाशनी पड़ती है। वह अपना पूरा ध्यान लगाएं और तनाव कम से कम लें।
अभिभावकों को भी करनी पड़ती है ट्रेनिंग
अभिभावक शोभित अग्रवाल बताते हैं कि बच्चों के साथ अभिभावकों को भी समय-समय पर ट्रेनिंग लेनी पड़ती है। बच्चे विद्यालय में कुछ ऐसा सीखते हैं जो हमें नहीं पता होता। उन्हें पढ़ाने और समझाने के लिए हमें खुद सीखने के दायरे खोलने पड़ते हैं। फिर उन्हें सिखाना होता है। मॉडर्न पेरेंटिंग के साथ पारंपरिक तरीके भी अपनाए जाते हैं।



