बदायूं

Budaun News: गंगा की कटरी में बसेगा तंबुओं का अस्थायी शहर

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A temporary city of tents will be built in the river Ganga.

ककोड़ा मेंले में बसा तंबुओं का शहर। फाइल फोटो

बदायूं। गंगा की कटरी में हर वर्ष लगने वाला मिनी कुंभ मेला ककोड़ा 20 नवंबर से शुरू हो रहा है। इस मेले को ऐतिहासिक बनाने के लिए जिला प्रशासन के साथ जिला पंचायत भी लगी हुई है। मेले में देश के कई राज्यों से दुकानदार अपनी दुकान लगाते हैं।

लाखों श्रद्धालु यहां कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान कर पुण्य कमाते हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन उनकी सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम करेगा। इसमें बरेली जोन के सभी जिलों की पुलिस के साथ पीएसी की कई कंपनियां तैनात रहेगी। उसका पूरा खाका प्रशासनिक स्तर पर तैयार किया जा रहा है।

जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर गंगा की कटरी में तंबुओं का शहर बसता है। पड़ोसी जिला कासगंज, फर्रुखाबाद, बरेली, शाहजहांपुर, रामपुर की सीमा से जुड़ने की वजह से यह मेला रुहेलखंड का प्रमुख मेला माना जाता है। इसका संचालन जिला पंचायत करता है। हर बार जिला पंचायत मेले को भव्य और अभूतपूर्व बनाने के लिए टेंडर प्रकिया को अपनाता है, चूंकि मेले की मेले की तिथि 20 नवंबर निर्धारित कर दी गई है। इसलिए मेले के लिए जिला पंचायत और जिला प्रशासन अपने स्तर से तैयारियों को विस्तृत रूप देने के लिए पूरी कार्ययोजना तैयार कर रहा है। मेला चार दिसंबर तक चलेगा। करीब 15 दिन चलने वाले इस मेले में उप्र के साथ ही उत्तराखंड, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों के बड़े दुकानदार आते हैं। इस बार मेले में आगरा का टैंट अपनी शोभा बढ़ाएगा।

बड़े पैमाने पर होता है जुआ : रुहेलखंड के मिनी कुंभ के नाम से प्रसिद्ध मेला ककोड़ा जुआ के लिए भी काफी चर्चाओं में रहता है। पुलिस हर साल जुआ न होने के दावे भी करती है, लेकिन तंबुओं के शहर में कई राज्यों से आने वाले बड़े जुआरी अपने मकसद में हमेशा कामयाब रहते हैं। स्थानीय लोगाें के अनुसार मेले में करोड़ों रुपये का जुआ हर साल होता है।

पहले चलती थी बैलगाड़ी और अब दौड़ती हैं लग्जरी कारें : वैसे तो ककोड़ा मेला देहात का प्रमुख मेला माना जाता है। स्थिति यह रहती है कि जिले भर के सैकड़ों गांवों के लोग बैलगाड़ी, डनलप, ट्रैक्टर-ट्राॅली से कई दिन पहले ही पहुंच जाते हैं, लेकिन समय के साथ अब मेले का स्वरूप काफी बदल गया है। बैलगाड़ी, डनलप के स्थान पर लग्जरी कारें पहियाें से धूल उड़ाती हुई गंगा की कटरी में दौड़ती हैं। लोगों का कहना है कि अब देहात क्षेत्र में भी बैलगाड़ी और डनलप खत्म से हो गए हैं। उनका स्थान पेट्रोल और डीजल से चलने वाली कारों ने ले लिया है।

मेले में बनेगी 15 किलोमीटर सड़क : मेला ककोड़ा में श्रद्धालुओं को आने-जाने में कोई परेशानी न हो, इसके लिए जिला पंचायत की ओर से 15 किलोमीटर सड़क बनाई जाएगी। कादरचौक-कादरबाड़ी रोड के बीच से मेला ककोड़ा के लिए रोड कटेगा। वहां से करीब डेढ़ किलो मीटर मेले की तरफ अस्थायी रोडवेज बस स्टैंड बनाया जाएगा। साथ ही वहां से मुख्य घाट तक एक किलोमीटर का मार्ग रहेगा। मुख्य घाट से डेढ़-डेढ़ किलोमीटर के दोनाें तक रोड बनाए जाएंगे। इसके साथ ही रोडवेज स्टैंड से डेढ़ किलोमीटर वीआईपी मार्ग और डेढ़ किलोमीटर बरेली मार्ग रहेगा। बाकी मेले के अंदर मार्ग बनाए जाएंगे।

करीब एक हजार तंबू लगेंगे : मेला ककोड़ा में इस बार करीब एक हजार तंबू लगेंगे जिसमें जिला पंचायत, व्यापारियाें, स्थानीय लोगों के द्वारा तंबू लगाए जाते हैं। वहीं मेले में 350 हैंडपंप लगाए जाएंगे। मेले में करीब 500 शौचालय बनाए जाएंगे। संपूर्ण रोशनी की व्यवस्था जनरेटर के माध्यम से रहेगी। मेले में लखनऊ से कठपुतली मंगाई जाएंगी जो सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करेगी। काला जादू, झूले आदि लगाए जाएंगे।

मेले में बनेगा अस्थायी अस्पताल: स्वास्थ्य विभाग की ओर से मेला ककोड़ा में अस्थायी अस्पताल, डाकघर, कोतवाली, रोडवेज बस स्टैंड, फायर ब्रिगेड स्टेशन भी बनाई जाएगी। जिससे श्रद्धालुओं को मेले में किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी।

ककोड़ देवी मंदिर से पूजा को जाएगी झंडी : कादरचौक ब्लाॅक क्षेत्र का ककोड़ा गांव कभी वन क्षेत्र रहा है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार गंगा नदी यही से होकर बहती थी। ऐसे में वन देवी क्षेत्र में औषधीय गुणों वाली ककोड़ नाम की घास थी। ककोड़ के नाम पर ही वनदेवी का नाम ककोड़ा देवी पड़ गया। वहीं ग्रामीणों के अनुसार यहां पर स्नान करने वालों के चर्म रोग स्वत: खत्म हो जाया करते थे। यह जानकारी उस समय के नवाब अब्दुल्ला को हुई। वह चर्म रोग से पीड़ित थे और तमाम हकीमों से उपचार करवा चुके थे। एक दिन उन्हें स्वप्न आया कि ककोड़ा देवी मंदिर के पास स्नान करें तो उनका चर्म रोग ठीक हो सकता है। जिस पर उन्होंने मंदिर के पास डेरा जमा लिया और वहां रहकर गंगा स्नान किया। इससे उनका चर्म रोग ठीक हो गया तभी से उन्होंने यहां मेला लगवाना शुरू कर दिया। वक्त के साथ मेले का विस्तार होता गया और इसकी जिम्मेदारी जिला पंचायत ने संभाल ली। मेला शुरू होने से पहले गंगा पूजन के लिए यहीं से झंडी जाती है।


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