बदायूं

Budaun News: पछेती धान पर ‘भूरा फुदका’ का हमला

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बदायूं /उझानी। पछेती धान की फसल भूरा फुदका कीट की चपेट में आ गई है। बारिश अधिक हो जाने के बाद खेतों में भरे पानी में इस कीट ने हमला किया तो पौधे सूखने लग गए। इसमें असंख्य कीटों का झुंड तने से ही धान के पौधे का रस चूस लेता है, जिससे पैदावार प्रभावित हो रही है।

इस बार निजी संसाधनों का इस्तेमाल कर जिन किसानों ने समय रहते धान की रोपाई कर ली, उन्हें फसल में कीट का सामना नहीं करना पड़ा। किसान नेत्रपाल ने बताया कि पौधों के बढ़वार के दिनों में ही बारिश ज्यादा होने लगी थी। सितंबर में ही दो-तीन बार झमाझम बारिश हुई। इसी वजह से खेतों से बारिश के पानी के निकास की व्यवस्था नहीं हो पाई। इस कीट की चपेट में जो भी पौधा आता है, वह पहले पीला दिखाई देता है, फिर सूखने लगता है। ऐसे पौधे में दाना नाममात्र का ही बच पाता है। भूरा फुदका का आकार सूक्ष्म होता है। असंख्य कीट पौधे को तने से चाट जाते हैं। भूरा फुदका को विषम परिस्थिति में भी उड़कर दूसरे पौधों को जल्दी ही चपेट में लेने की महारथ हासिल है।

हाइब्रिड समेत पूसा प्रजातियों का रकबा अधिक: धान उत्पादकों का पिछले पांच-छह साल से हाइब्रिड प्रजातियों की तरफ रुझान बढ़ा है। बताते हैं कि पूसा प्रजातियों के धान के मुकाबले हाइब्रिड की पैदावार अधिक होती है। पूसा प्रजाति में बासमती, रेशम, शरवती चावल के अलावा 1121 और 1718 प्रजाति का धान पतला होने की वजह से लोगों की पसंद में सबसे ऊपर है। मोटे धान में जया की पैदावार तो अधिक है, लेकिन खाने में ज्यादा स्वादिष्ट नहीं होता। इन सभी प्रजातियों के धान की रोपाई जून में हो जानी चाहिए, जो अक्तूबर में पककर तैयार हो जाता है। इसके बाद अगर वह जुलाई के अंत तक रोपाई करता है तो वह पिछेती कहलाता है।

बारिश के दौरान तेज हवा चलने से हो चुका नुकसान: पिछले महीने बारिश के दौरान तेज हवा भी चली थी। खेतों में बारिश का पानी भरने से पौधों की जड़ें कमजोर पड़ीं तो पौधे हवा की मार नहीं झेल पाए। उझानी, बिल्सी, बिसौली, सहसवान, दातागंज आदि इलाके के अधिकतर खेतों में धान गिर गया। गिरे पौधों की बालियों में दाना मोटा नहीं हो पाया। पैदावार प्रभावित करने में यह दूसरी वजह बताई जा रही है।

जिले में करीब 85 हजार हेक्टेयर में है धान की फसल: जिला कृषि अधिकारी डीके सिंह के अनुसार, जिले में करीब 85 हजार हेक्टेयर में धान की फसल हैं। जैसे ही किसानों को इस रोग के बारे में जानकारी हो, वे तुरंत ही दवाइयों का उपयोग करें। हालांकि, दवा का उपयोग किस प्रकार करना है, इसके बारे में विभाग आकर वैज्ञानिकों से बात जरूर कर लें।

मुनेश।

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