Budaun News: मेडिकल कचरे का नहीं हो पा रहा निस्तारण, कोई जला रहा कोई रास्ते पर फेंक रहा

जिला अस्पताल में कूड़े में डालने को ले जाते मेडिकल कचरा। संवाद
बदायूं। जिले में निजी नर्सिंग होम संचालकों के साथ-साथ जिला अस्पताल में भी मेडिकल कचरे का निस्तारण नहीं हो रहा है। निजी नर्सिंग होम वाले कई दिनों का इकट्ठा मेडिकल कचरा इधर, उधर फेंक देते हैं तो जिला अस्पताल में जला दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी स्वास्थ्य विभाग को न हो, लेकिन कार्रवाई करने को कोई तैयार नहीं है।
अस्पतालों से निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट का निस्तारण बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट में होना चाहिए। यह नियम सरकारी और प्राइवेट दोनों ही अस्पतालों में लागू है। प्राइवेट अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन कराने से पहले अस्पताल संचालक को बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट से किए गए करार के कागजातों को शामिल करना होता है। मगर, यहां बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तारण को लेकर जिम्मेदार गंभीर नहीं हैं। इस वजह से निजी नर्सिंग होम संचालक प्लांट तक कचरा भेजने में आने वाला खर्च बचाने के चक्कर में इसका निस्तारण नहीं कराते हैं तो जिला अस्पताल में भी कचरा निस्तारण के नाम पर खेल चल रहा है।
जिला अस्पताल में इमरजेंसी से लेकर ऑपरेशन थियेटर और अन्य वार्डों से निकलने वाले मेडिकल कचरे को जिला अस्पताल परिसर में ही इकट्ठा कर जला दिया जाता है। इससे निकलने वाले दूषित धुआं से आसपास के लोग काफी परेशान हैं। जिला अस्पताल के आसपास में रहने वाले लोग कई बार इसको लेकर शिकायतें दर्ज करा चुके हैं इसके बाद भी अस्पताल प्रबंधन की ओर से सुधार नहीं किया जा रहा है।
तीसरे दिन कचरा उठने का प्रावधान
– सरकारी अस्पतालों से लेकर निजी नर्सिंग होम से तीसरे दिन मेडिकल कचरा उठाने का प्रावधान है। नियम के तहत बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट से तीसरे दिन कचरा वाहन अस्पतालों में पहुंचना चाहिए, जहां पॉलीथिन में बंद कचरे को ले जाना चाहिए। मगर, यहां कचरा उठाने के लिए सात-सात दिन तक वाहन नहीं पहुंचता है। इस बात की कोई शिकायत इसलिए नहीं करता क्योंकि कचरा नियमित तौर पर उठाने के लिए प्लांट को ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे। इसलिए स्वास्थ्य विभाग के नियमों से बचने के लिए प्लांट का कर्मचारी यहां सात या आठ दिन बाद आता है और निजी नर्सिंग होम, सरकारी अस्पतालों में नियमित दिनों की हाजिरी लगा जाता है। ताकि अगर चेकिंग हो तो निजी अस्पताल संचालक और सरकारी अस्पतालों के प्रबंधन कार्रवाई से बच सकें।
इस तरह होना चाहिए मेडिकल कचरे का निस्तारण
अस्पतालों में मेडिकल कचरे को रखने के लिए तीन रंग के डिब्बे रखे जाते हैं। सभी में अलग-अलग प्रकार का मेडिकल कचरा डाला जाता है। लाल रंग के डिब्बे में यूरिन बैग, ग्लब्स, ब्लड बैग, सिरिंज आदि डाली जाती हैं। पीले रंग के डिब्बे में टिश्यू, रूई, पट्टी, बच्चे की नाल आदि डाले जाते हैं। नीले रंग के डिब्बे में दवाओं का कचरा, ब्लेड, प्लास्टिक और कांच की टूटी बोतलें आदि सामान डाला जाता है। इसके बाद बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट की ओर से आने वाला कचरा वाहन इनको भरकर ले जाता है। बाद में प्लांट में उस कचरे का निस्तारण किया जाता है।
मेडिकल कचरे से फैलती हैं यह बीमारियां
– जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजीशियन डॉ. राजीव गुप्ता ने बताया कि मेडिकल कचरे को जलाने से जो गैस निकलती है उससे कैंसर, सांस, पीलिया की बीमारी हो सकती है। इससे खासकर वेक्टर जनित रोग होने की संभावना अधिक होती है, क्योंकि इस पर जो मक्खी अथवा मच्छर बैठता है वह रोग का वाहक बन जाता है। वह जिस व्यक्ति के संपर्क में आता है वह रोग का शिकार हो जाता है। इसके अलावा डायरिया, एचआइवी, हेपेटाइटिस बी, सी, टायफाइड आदि रोग तेजी से फैलता है।
– मेडिकल कचरे के निस्तारण पर समय-समय पर निर्देश देते रहते हैं। फिर भी ठेके पर काम कर रहे कुछ सफाईकर्मी अगर उस कचरे को अस्पताल में जला रहे हैं तो उनका जवाब तलब किया जाएगा। मेडिकल कचरे का निस्तारण शत प्रतिशत कराया जाएगा। – डॉ. कप्तान सिंह, सीएमएस जिला अस्पताल

जिला अस्पताल में कूड़े में डालने को ले जाते मेडिकल कचरा। संवाद