मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी से सब बैचेन: किस सिर सजेगा जीत का ताज, राजनीतिक पंडित भी नहीं भांप पा रहे माहौल

मुस्लिम मतदाता
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निकाय चुनाव में बरेली के मतदाताओं की बेरुखी ने प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ा दी है। लगभग चार फीसदी कम मतदान का किसे नुकसान और किसे फायदा, इस पर सभी अपने-अपने हिसाब से उधेड़बुन में जुटे हैं। प्रत्याशियों की सबसे ज्यादा मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी बेचैन कर रही है। हालांकि, इस तथ्य से किसी को इनकार नहीं कि मुकाबला बेहद करीबी है और हार-जीत का अंतर पिछली बार से भी कम होने की उम्मीद है। मतदाताओं ने किसे चुना है, यह शनिवार को मतगणना के बाद ही पता चल सकेगा।
मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं के अपने-अपने दावे हैं। भाजपाई खेमे की नजर से देखें तो मुस्लिम वोट एकमुश्त नहीं गया है। इसके पीछे तर्क यह है कि कुछ मौलानाओं की बयानबाजी से मुसलमान मतदाता भ्रमित हो गए। इसके पीछे आईएमसी के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा खान और मौलाना शहाबुद्दीन के उन बयानों का हवाला दिया जा रहा है, जिसमें उन्होंने भाजपा और सपा से अलग दूसरे विकल्पों पर विचार करने की अपीलें की थीं।
भाजपाई कर रहे यह दावा
भाजपाई यह भी मानते हैं कि तीन तलाक का मुद्दा, जिसके खिलाफ बरेली से ही आवाज बुलंद हुई थी, इसका लाभ उन्हें अब भी मिल रहा है। दावा है कि शिक्षित मुस्लिम महिलाएं अब उन्हीं के पाले में हैं। आला हजरत दरगाह के सज्जादानशीन अहसन मियां को भी ऐसे देखे जा रहा है कि पहले चरण में कम मतदान होने के बाद उन्होंने कहा था कि जो आपकी फिक्र करता हो, ऐसे प्रत्याशी को वोट जरूर देना।



