Rampur News: जी-20 शिखर सम्मेलन की प्रदर्शनी में दिखेगा अकबर का लघु चित्र
रामपुर। रामपुर रजा लाइब्रेरी में मौजूद विश्व धरोहर के रूप में शामिल ऐतिहासिक पांडुलिपि ”दीवान-ए-हाफिज” में शामिल मुगल शासक अकबर के लघु चित्र का दीदार विदेशी मेहमान भी करेंगे। दिल्ली में हो रहे जी-20 शिखर सम्मेलन की प्रदर्शनी में अकबर का यह लघु चित्र लगाया जाएगा। रजा लाइब्रेरी ने यह लघु चित्र संस्कृति मंत्रालय को भेजा है।रामपुर रजा लाइब्रेरी एशिया की प्रसिद्ध लाइब्रेरी है। इस लाइब्रेरी में कई दुर्लभ पांडुलिपियां हैं। रजा लाइब्रेरी में संग्रहित दीवान-ए-हाफिज का इतिहास काफी पुराना है। 1575 ईसवी की की इस पांडुलिपि की एक प्रति पूर्व में भारतीय संस्कृति निदेशालय की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने 29 अगस्त 2012 को ईरान के दौरे के समय वहां के राष्ट्रपति डाॅ. अहमदीनेजाद को भेंट की थी।
यही नहीं दीवान-ए-हाफिज को यूनेस्को ने विश्व धरोहर के रूप में शामिल किया है। खास तौर से इस पांडुलिपि के 11 लघु चित्र यूनेस्को में काफी पसंद किए गए हैं। अब यही दीवान-ए-हाफिज दिल्ली के जी-20 शिखर सम्मेलन की शान बढ़ाएगा। दीवान-ए-हाफिज में शामिल अकबर के लघु चित्र को जी-20 में प्रदर्शन के लिए चयनित किया गया है। (संवाद)
मोदी भी उपहार स्वरूप भेंट कर चुके हैं दुर्लभ पांडुलिपियों की प्रतियां
रजा लाइब्रेरी मुस्लिम देशों से भारत के रिश्तों की मजबूती में एक बड़ा माध्यम रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रजा लाइब्रेरी की दुर्लभ पांडुलिपियों की प्रतिलिपियां मुस्लिम देश के शासकों को उपहार के तौर पर सौंप चुके हैं। 2016 में ईरान में वहां के सर्वोच्च नेता सैयद अली खमनेई को उन्होंने हजरत अली के हाथों लिखी दुर्लभ कुरान की प्रति भेंट की थी। वहां के राष्ट्रपति हसन रुहानी को 1715 में फारसी में अनुदित सुमेर चंद की रामायण उपहार स्वरूप दी थी। इससे पूर्व वह 2015 मंगोलिया में वहां के राष्ट्रपति साखिगिन इलबेडोर्ज को मंगोलों के इतिहास पर लिखी ”जामिउत तवारीख” की दुर्लभ पांडुलिपि की प्रति भेंट कर चुके हैं। 13वीं सदी के मंगोलों के इतिहास पर इसमें महत्वपूर्ण जानकारी है। यह पांडुलिपि इलखानेत राजा गजन खान (1295-1304) में से एक है। इसमें ओलजीतजू (1304-1316) तक का इतिहास फारसी में लिपिबद्ध है। प्रधानमंत्री कार्यालय से समय-समय किसी न किसी दुर्लभ पांडुलिपि की प्रतिलिपि की मांग रजा लाइब्रेरी से होती रहती है। प्रधानमंत्री इन पांडुलिपियों की प्रतिलिपियों को समय-समय पर मुस्लिम देशों के शासकों को स्वयं भेंट करते हैं। दुर्लभ संग्रह को देखकर मुस्लिम शासक भी उन्हें सम्मान व हिफाजत से रखते हैं।