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Rampur News: देेश के लिए बिलासपुर के बलजीत ने सीने पर झेली थीं कई गोलियां

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रामपुर। 24 साल पहले कारगिल युद्ध में शहीद हुए उत्तराखंड सीमा से सटे गांव नवाबगंज निवासी सरदार बलजीत सिंह की शहादत को उनके परिजन व गांव के लोग आज भी उनके बलिदान को दिलों में संजोए हैं। बलजीत सिंह की कुर्बानी की कहानी उनके बड़े भाई की जुबानी…

कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या पर शहीद बलजीत सिंह के बड़े भाई रणजीत सिंह ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान उनके भाई बलजीत सिंह की तैनाती पुंछ के राजौरी की कृष्णा घाटी में थी। रात में दुश्मनों के हमले के दौरान बलजीत सिंह दुश्मनों पर भारी पड़े। उन्होंने कई दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया था। इस दौरान उनके सीने और पेट में कई गोलियां लगी थीं, लेकिन देशभक्ति का उनका जज्बा कम नहीं हुआ। कई गोलियां लगने के बाद भी वे सीना ताने दुश्मनों पर लगातार वार करते रहे। रात 1: 35 बजे सीने में दुश्मन का गोला (ब्रस्ट) लगने से उनकी मौत हुई थी। कारगिल युद्ध के दौरान नौ जुलाई 1999 को एक साथी सैनिक ने कश्मीर से फोन पर उन्हें युद्ध के दौरान बलजीत सिंह के शहीद होने की सूचना दी थी। सूचना मिलने के बाद पूरे गांव में मातम पसर गया था, लेकिन उनके पिता सरदार करनैल सिंह को देश के लिए बेटे के शहीद होने पर गर्व था। 11 जुलाई 1999 को गांव में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया था। तत्कालीन जिलाधिकारी निवेदिता शुक्ला वर्मा और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार अग्रवाल आदि अधिकारियों व राजनीतिक लोगों ने शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की थीं।

हो गई थी सगाई, शादी से पहले हो गए शहीद

शहीद बलजीत सिंह के बड़े भाई ने आंखों से आंसू पोछतें हुए बताया कि बलजीत सिंह परिवार का सपना पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर सेना में भर्ती हुआ थे। सेना में भर्ती होने के चार साल बाद पूरा परिवार उनकी शादी की तैयारी कर रहा था। बलजीत सिंह की सगाई हो चुकी थी। पूरा परिवार शादी की खुशियां मना रहा था, लेकिन नौ जुलाई को कारगिल में शादी से पहले ही बलजीत सिंह शहीद हो गए।

बोले… भाई ने पूरे परिवार का किया था सपना पूरा

सीमांत प्रदेश उत्तराखंड की सीमा से सटे गांव नवाबगंज निवासी स्वर्गीय करनैल सिंह के घर चार मई 1976 को कारगिल में शहीद हुए सरदार बलजीत सिंह को जन्म हुआ था। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। उनके दो बड़े भाई सरदार रणजीत सिंह व सरदार हरजीत सिंह आज भी गांव में खेती करते हैं। शहीद के भाई रणजीत सिंह ने भावुक होते हुए बताया कि वह खुद सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा करना चाहते थे, लेकिन कुछ विषम परिस्थितियों के कारण वह सेना में नहीं जा सके। बलजीत सिंह पूरे परिवार के लाडले थे। इसलिए पूरे परिवार ने बलजीत सिंह को सेना में भर्ती कराने के लिए हर संभव प्रयास किया। बलजीत सिंह ने उत्तराखंड के जिला उधम सिंह नगर के कस्बा गदरपुर के एक इंटर कॉलेज से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण कर सेना में भर्ती होने के प्रयास शुरू कर दिए थे। पूरे परिवार के लिए वो खुशी का दिन भी आया, जब वर्ष 1995 में बलजीत सिंह का सेना में चयन हो गया। उनकी पहली तैनात सेना के 171 फील्ड रेजीमेंट तोपखाना में हुई थी। उनकी सफलता से पिता करनैल सिंह इतने खुश थे कि स्वयं उन्हें तैनाती स्थल तक छोड़ने के लिए गए थे।

उपेक्षा का शिकार, शहीद बलवीर सिंह का परिवार

बिलासपुर। ग्राम नवाबगंज निवासी कारगिल शहीद बलजीत सिंह के भाई रणजीत सिंह ने बताया कि उनके भाई का जब गांव में अंतिम संस्कार किया गया था, तब तत्कालीन जिलाधिकारी निवेदिता शुक्ला वर्मा ने उनकी मां स्वर्गीय शमशेर कौर को दस लाख रुपये का एक चेक सरकार की ओर से दिया था। इसके अलावा परिवार को कोई भी सुविधा नहीं दी गई। जबकि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने एक पेट्रोल पंप, गांव का नाम शहीद के नाम बदलने, गांव में स्टेडियम बनाने, गांव की रोड का नाम शहीद के नाम पर रखे जाने आदि घोषणाएं की गई थीं। मगर 24 साल बीतने के बाद भी एक भी घोषणा पूरी नहीं हो सकी है। भाई रणजीत सिंह व हरजीत सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने भाई की याद में एक प्रतिमा जयपुर में बनवाई थी। निजी खर्चे से प्रतिमा बनवाकर यहां गांव के बाहर मेन रोड स्थित चौराहे पर लगाई है। एक बार प्रतिमा की बंदूक खंडित हो गई थी। उनका आरोप है कि प्रशासन ने बंदूक की मरम्मत तक नहीं कराई। वह भी उन्होंने निजी खर्चे से मरम्मत कराई।

शहीद के सम्मान में नहीं आने दी जाएगी कोई कमी

उपजिलाधकारी अमन देव ने बताया कि उनकी अभी नई पोस्टिंग है। उन्हें शहीद बलजीत सिंह के बारे में जानकारी हुई है। वह शहीदों का बहुत सम्मान करते हैं और शहीद बलजीत सिंह के सम्मान में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं आने देंगे। वह स्वयं गांव पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे व उनके परिजनों को सम्मान देंगे।

गांव का नाम शहीद के नाम कराने का कराया जाएगा प्रस्ताव : भागवती

नवाबगंज गांव की ग्राम प्रधान भागवती देवी का कहना है कि गांव का नाम शहीद बलजीत सिंह के नाम पर रखे जाने का प्रस्ताव वह ग्राम पंचायत की खुली बैठक में पारित करके खंड विकास अधिकारी को भेजेंगी। इसके बाद वह उच्चाधिकारियों से मिलकर गांव का नाम शहीद के नाम पर रखे जाने का कार्य शीघ्र ही पूरा कराने का प्रयास करेंगीं। उन्होंने कहा कि शहीद की बरसी के मौके पर शहीद की प्रतिमा, समाधि स्थल ,गांव की प्रमुख सड़कें पूरी तरह से साफ सुथरी कराई जाएंगी। ताकि आने वाले लोगों को किसी भी तरह की असुविधा न हो सके। उन्होंने कहा कि वह सीमित संसाधनों में उक्त कार्य कराने का पूरा प्रयास कर रही हैं।


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