Rampur News: सावन के महीने में अब सिर्फ यादों के झूले

किरन पाठक।
रामपुर। आधुनिकता की दौड़ में परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। एक दौर था जब गांवों में हर गली मोहल्ले में पेड़ोंं पर पड़ने वाले झूले ही सावन का एहसास कराते थे, लेकिन आज ढूंढने से भी झूले कहीं नहीं दिखाई देते। गांव के बड़े़-बुजुर्ग आज भी झूलों को याद करते हैं। झूलोंं के विलुप्त होने का बड़ा कारण टीवी, मोबाइल जैसे मनोरंजन के सुगम साधन उपलब्ध होना और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई है।
पुराने समय में सावन शुरू होते ही हाथों में मेहंदी लगाए बहन-बेटियां अपने मायके आ जाती थीं। गांवों के साथ ही कस्बों में भी ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर मोटी-मोटी रस्सियों के झूले पड़ते थे। जिन पर महिलाएं, बच्चे और युवा पींगे बढ़ाते नजर आते थे। झूला झूलने के साथ ही महिलाएं सावन के गीत गाती थीं। ऐसी ही मस्ती में पूरा सावन गुजरता था। परंतु आज के समय में झूले लगभग विलुप्त हो चुके हैं। अब गांवों में ऐसे पेड़ नहीं बचे हैं, जहां झूलेे डाले जा सकें। बच्चे भी मोबाइल फोन में इतना व्यस्त हो चुके हैं कि उन्हें झूलों का एहसास तक नहीं है। परंतु बुजुर्ग आज भी उस दौर को याद करते हैं।
स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद हैं झूले
झूला झूलते समय पींगे बढ़ाने से पूरे शरीर की कसरत होती है, जो स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। सावन के महीने में हवा अन्य महीनों की अपेक्षा काफी अच्छी होती है। इसलिए खुली हवा में सांस लेना काफी फायदेमंद होता है। इसके अलावा सावन में चारों ओर हरियाली होती है जो आंखों के लिए फायदेमंद होती है।
अब नहीं रहे बाग-बगीचे
शहरीकरण के नाम पर बाग-बगीचे तेजी से विलुप्त होते जा रहे हैं। इसके अलावा गांवों में भी विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है। इसके कारण झूला डालने के लिए भी अब पेड़ नजर नहीं आते हैं। पहले हर गली, मोहल्ले में नीम, पीपल, पाखड़ जैसे ऊंचे वृक्ष होते थे। अब इन वृक्षों के न होने के कारण झूले नही पड़ पाते हैं। शहरों में हरियाली के नाम पर अब सिर्फ पार्क बचे हैं।
पहले गांवों में बड़े-बड़े वृक्ष होते थे। उन वृक्षों की शाखाओं पर झूले पड़ते थे। महिलाएं सावन के गीत गाती थीं। तब गांवों में काफी अच्छा लगता था। अब वो दौर ही समाप्त हो चुका है। आजकल के बच्चे भी झूलों को लेकर उत्साहित नहीं दिखते। – हरप्यारी शर्मा
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मेरा मायका शाहबाद का है और ससुराल बरेली जिले के फतेहगंज की है। बचपन में सावन में झूले पड़ते थे। काफी अच्छा लगता है। अब मायके और ससुराल कहीं भी झूले दिखाई नहीं देते। बच्चे भी अब झूला झूलने के बजाय फोन में ही व्यस्त रहते हैं। – अंजुल शर्मा
पुराने दिन काफी अच्छे थे। सावन में ससुराल से महिलाएं मायके आ जाती थीं। पेड़ों पर झूले पड़ते थे। हम सभी झूले झूलते थे। अब पूरा दौर ही बदल गया। अब कहीं भी झूले नहीं दिखाई देते। न तो मेरे मायके बदायूं में और न यहां ससुराल में झूले दिखते हैं। – किरण पाठक

किरन पाठक।

किरन पाठक।

किरन पाठक।


