शाहजहाँपुर

Shahjahanpur News: आजादी के संघर्ष में शाहजहांपुर का अविस्मरणीय योगदान

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शाहजहांपुर। 15 अगस्त 1947… देश के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तारीख है। आज का सूरज देश की स्वतंत्रता का संदेश लेकर आया था। अनगिनत लोगों के बलिदान और संघर्ष की कीमत पर मिली इस आजादी में शाहजहांपुर का भी अविस्मरणीय योगदान है।

एसएस कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि स्वाधीनता की लड़ाई में जिला शाहजहांपुर का योगदान ऐतिहासिक रहा है। दो ऐसे कालखंड आए जब जिले के निवासियों ने राष्ट्रीय स्तर पर आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया। 1857 में जब पूरे देश में अंग्रेजों ने क्रांति को दबा दिया था तब मुगल बादशाह के भतीजे, उनके जनरल बख्त खान, मौलवी अहमदुल्लाह शाह, नाना साहिब शाहजहांपुर से ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेते रहे।

दूसरा अवसर तब आया जब गांधी जी ने 1922 में असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इसके बाद शहर के युवा पं. रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खान ने राष्ट्रीय स्तर की क्रांति की उठी दूसरी धारा का नेतृत्व किया। शचींद्र सान्याल के साथ मिलकर बिस्मिल ने हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक एसोसिएशन बना ली और इसी के बैनर तले बहुचर्चित काकोरी ट्रेन एक्शन को अंजाम दिया।

गांधीवादी आंदोलनों असहयोग, सविनय अवज्ञा तथा भारत छोड़ो आंदोलन में जनपद के नागरिकों की भूमिका रही। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान शहर से सटे अजीजगंज में नमक कानून तोड़ने के लिए विशेष प्रयास किए गए। महिलाएं भी इस आंदोलन में बढ़ चढ़कर प्रतिभाग कर रहीं थीं। इस आंदोलन में 80 से ज्यादा लोगों को सजा मिली।

1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ हुआ तब शहर कांग्रेस में पं. शिवकुमार मिश्रा, पुरुषोत्तम दास टंडन, लाखन दास नेता थे। उनकी गिरफ्तारी के बाद आंदोलन भूमिगत हो गया और इसकी कमान मनीलाल खन्ना, उनके भाई बसंत लाल खन्ना, मुन्नालाल गुप्ता, उमा देवी, मुक्ता प्रसाद, गार्गी दीन, विशंभर दयाल अवस्थी, जानकी प्रसाद ने संभाल ली। तिलहर, रोजा, कहिलिया में रेल की पटरियां उखाड़ दी गईं। सिग्नल तोड़ डाले। बहादुरगंज में युवाओं, स्कूली छात्रों से पुलिस की मुठभेड़ हुई। बड़ागांव, तिलहर, पुवायां भी बेहद अशांत थे।

आजादी की पहली सुबह का साक्षी है अशोक का वृक्ष

कलक्ट्रेट परिसर में लगा अशोक का पेड़ आजादी की पहली सुबह का साक्षी है। आजादी की घोषणा के बाद 15 अगस्त 1947 को तत्कालीन कलेक्टर जगन्नाथ त्रिपाठी ने पत्नी भागीरथी देवी के साथ कलक्ट्रेट में स्वतंत्रता का पौधा नाम से अशोक का पौधा लगाया था। आज के दिन यह अशोक का पेड़ भी अपने 76 साल पूरे कर रहा है।

आजादी की लड़ाई में शाहजहांपुर देश के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे चला है। नई पीढ़ी को याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रता के लिए हमारे पूर्वजों ने कितना संघर्ष किया है।

– विकास खुराना, इतिहास विभागाध्यक्ष, एसएस कॉलेज


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