Budaun News: कभी गांवों में गाए जाते थे बन्ना-बन्नी…अब डीजे का धमाल
बदायूं। समय के साथ परिवर्तन लाजिमी है तो तीज त्योहार समेत परंपराओं को निभाने का तरीका भी बदल गया है। पहले सावन के महीने में गांवों में झांझ, मजीरा और खड़ताल बजते थे और बन्ना-बन्नी गाए जाते थे तो वहीं अब डीजे का धमाल मचता है। सावन को पहले मधुर गीतों के बिना अधूरा समझा जाता था वहीं अब इन गीतों का स्थान अब तेज संगीत और पैरोडी गीतों ने ले लिया है।
सावन का महीना पूरे साल में अनोखा ही होता है। बारिश की फुहारें जहां प्रत्येक व्यक्ति को आनंदित करती हैं वहीं भगवान भाेले की भक्ति में भी लोग रंग जाते हैं। बुजुर्गां के अनुसार, कई साल पहले जब ये आधुनिक गीत नहीं होते थे तो पुराने गीत सावन में गाए जाते थे। झांझ, मजीरा और खड़ताल पर लोग रात रात भर गांवों के चबूतरों पर बैठकर गीत गाया करते थे और सावन का स्वागत करते थे। सावन शुरू होते ही घरों में और बागों मे झूले पड़ जाते थे और युवतियां और महिलाएं झूला झूलते हुए समूह में सावन के गीत गाती थी, लेकिन अब समय बदल चुका है। झांझ, खड़ताल जैसे वाद्ययंत्र तो आज की पीढ़ी जानती तक नहीं है। इनका स्थान बड़े बड़े डीजे और पैरोडी गीतों ने ले लिया है। हालांकि गांवों के लोग पुरानी पंरपराओं को अभी भी कुछ हद तक जीवित रखे हुए हैं।
अब युवाओं में कांवड़ लाने की होड़
आज से करीब 25 साल पहले की बात करें तो इक्का दुक्का लोग ही कांवड़ लाते थे लेकिन जैसे जैसे समय आगे बढ़ता गया, युवाओं में मानों इसकी होड़ लग गई। इस होड़ में महिलाएं, युवतियां और बच्चे भी शामिल होते गए। अब तो पहले और आखिरी सोमवार को कछला रोड पर मानों कांवड़ियो का सैलाब ही उमड़ पड़ता है। कांवड़ सजाने की प्रतियोगिताएं भी हो रही हैं तो यह भी प्रतिस्पर्धा है कि कौन कितना महंगा डीजे लेकर निकलता है।
एनएमएसएन दास कॉलेज के सेवानिवृत्त संगीतज्ञ डॉ. मदनमोहन लाल बताते हैं कि पुराने समय में खेतों की बुआई करते वक्त लोकगीत गाये जाते थे। सावन में तो इनका महत्व और बढ़ जाता था। पहले बन्ना-बन्नी इस मौसम का प्रमुख गायन था तो कांवड़ में भी कुछ लोग ढोलक और मृदंग लेकर चलते थे लेकिन अब इसकी जगह पैरोडी और आधुनिक गीतों ने ले ली है। पहले मजीरा और खड़ताल लेकर चला जाता था लेकिन अब तो शंकर जी के प्रिय डमरू को भी प्रतीक की तरह इस्तेमाल किया जाता है। बताते हैं कि राग मियां मल्हार, राग गौण मल्हार भी इसी मौसम में गाये जाते थे। ये राग इतने कर्णप्रिय होते थे कि सुनते ही बनते थे।



