रामपुर

Rampur News: सुदामा चरित्र के प्रसंग को सुनकर श्रद्वालु हुए विभोर

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खजुरिया। कथावाचक उपासना शास्त्री द्वारा श्रद्धालुओं को कृष्ण- सुदामा प्रसंग को सुनाया । उन्होंने कहा कि सुदामा जैसा मित्र न था और न ही होगा।

शुक्रवार को चंदपुरा जदीद गांव के प्राचीन शिव मंदिर पर मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के आखिरी दिन शनिवार को फिरोजाबाद के शिकोहाबाद से आई कथावाचक उपासना शास्त्री ने कृष्ण और सुदामा की मित्रता के बारे में कथा को श्रद्धालुओं के समक्ष प्रस्तुत किया। कथावाचक शास्त्री ने अपने प्रवचनों के माध्यम से सभी श्रद्धालुओं को बताया कि बहुत प्राचीन समय की एक बात है कि कृष्ण और सुदामा सदीपनि गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। तभी कृष्ण और सुदामा की मित्रता हो गई। उसी समय एक दिन गुरु सांदीपनि की पत्नी ने जंगल में कृष्ण और सुदामा को लकड़ी लेने के लिए भेजा था। उन्होंने सुदामा जी को बुलाकर जंगल में खाने के लिए कुछ चने दे दिए थे। जिसे सुदामा जी ने अपने पास चुपचाप रख लिए थे। अचानक जंगल में आंधी तूफान और वर्षा होने लगी, जिसको लेकर कृष्ण जी एक पेड़ के ऊपर बारिश से बचने के लिए बैठ गए और उसी पेड़ के नीचे सुदामा जी खड़े हो गए। सुदामा जी ने कृष्ण जी से छिपकर गुरु की पत्नी द्वारा दिए गए चने को खाने लगे। कृष्ण जी ने जब दांतों की कट कट की आवाज सुनी तो उन्होंने कहा कि सुदामा जी क्या खा रहे हो, तब सुदामा जी ने कहा की ठंड की वजह से मेरे दांत कट कटा रहे हैं। कृष्ण जी ने मन ही मन उन्हें निर्धन होने का श्राप दे दिया। कुछ दिन बीत जाने के बाद सुदामा जी बहुत ही निर्धन हो गए और वह भीख मांग कर अपना गुजारा करने लगे। गरीबी से तंग आकर उनकी पत्नी सुशीला ने सुदामा से कहा कि कृष्ण भगवान तुम्हारे मित्र हैं। वह द्वारिका के राजा हैं। तुम उनके पास जाकर अपनी सारी व्यथा बता देना और वहां जाकर तुम्हारे सारे दुख दूर हो जाएंगे। सुशीला द्वारा काफी आग्रह करने के बाद सुदामा जी को कुछ चावल देकर कृष्ण जी के यहां द्वारिकापुरी भेजा। वहां जाकर सुदामा जी ने द्वारपालों से कहा अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो कि तुम्हारे दर पर गरीब सुदामा आया है। कृष्ण जी ने जब सुदामा के आने की बात सुनी तब वह नंगे पैर ही सुदामा जी के पास आ गए और गले लगा लिया। इसके बाद कृष्ण जी ने कहा कि हमारी भाभी ने हमें जो कुछ दिया है, उसे आप हमसे क्यों छुपा रहे हो। तब उन्होंने चावल की पोटली कृष्ण जी को दे दी। कृष्ण जी ने दो मुट्ठी चावल खाए और उन्हें दो लोकों का राज्य दे दिया। तब उन्हें उस श्राप से मुक्ति मिल पाई। इसलिए सभी व्यक्तियों से कथावाचक ने कहा की गुरु से कपट और मित्र से चोरी या होये निर्धन या होये कोढ़ी अर्थात कभी भी हमें अपने गुरु से कपट नहीं करना चाहिए कभी भी हमें मित्र से चोरी नहीं करनी चाहिए और जो व्यक्ति अगर गुरु से कपट और मित्र से चोरी करते हैं तो उनका हाल गरीब सुदामा जी जैसा हो जाता है।


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