Shahjahanpur News: अकेलापन बच्चों को बना रहा हिस्टीरिया का शिकार
शाहजहांपुर। आठ से 12 वर्ष तक की उम्र के बालक-बालिकाएं हिस्टीरिया के शिकार होने लगे हैं। मनोचिकित्सक मानते हैं कि अभिभावकों के दूसरे बच्चों से आगे निकलने की होड़, दोस्तों के दूर होने, पढ़ाई समेत कई तरह का दबाव बच्चे सहन नहीं कर पा रहे हैं। राजकीय मेडिकल कॉलेज के मन कक्ष में इस बीमारी से पीड़ित तीन से चार बच्चे प्रतिदिन आते हैं। इनमें लड़कियों की संख्या अधिक है।
आमतौर पर नौकरीपेशा अभिभावकों का तबादला दूसरे जनपद में होने पर बच्चों को बदले माहौल में ढलने में समय लग जाता है। मित्र मंडली छूटने, अभिभावकों द्वारा दूसरे बच्चों से आगे निकलने और घर से लेकर पढ़ाई तक के लोड ने बच्चों की चिंता में इजाफा कर दिया। डॉक्टरों की मानें तो कन्वर्शन डिसऑर्डर आमतौर पर अचानक से विकसित होते हैं।
ये लक्षण तंत्रिका तंत्र की समस्याओं की तरह दिखते हैं। इसके लक्षण और उसकी गंभीरता एक व्यक्ति से दूसरे में भिन्न हो सकती है। राजकीय मेडिकल कॉलेज के मनोविज्ञान कक्ष में ओपीडी में प्रतिदिन 50 से 60 मरीज आते हैं। इनमें हर रोज तीन से चार केस हिस्टीरिया के आना आम बात हो गई है।
ये हैं लक्षण, अभिभावक समझ बैठते भूत-प्रेत का चक्कर
हिस्टीरिया से पीड़ित बच्चे को सांस लेने में दिक्कत होने के साथ तीन से चार घंटे तक बेहोशी छा जाती है। गंध नहीं लगना, संतुलन नहीं बनना, दृष्टि संबंधी समस्या, निगलने में कठिनाई होना आम बात है। मरीज के अपना सिर घुमाने पर अभिभावक इसे भूत-प्रेत का चक्कर समझ लेते हैं।
शहर के तारीन टिकली निवासी 10 साल की लड़की थोड़ी-थोड़ी देर में बेहोश हो रही थी। उसकी बेहोशी घंटों तक चलती थी। घबराहट, सांस लेने में दिक्कत, शरीर में कंपकंपी की समस्या रहती थी। पूछताछ की तो माता-पिता के आपसी विवाद और बेटी को डांटने का कारण बीमारी के मूल में मिला। काउंसलिंग के साथ दवा से उसे आराम मिला।
बरेली मोड़ निवासी आठ वर्ष की लड़की की थोड़ी-थोड़ी देर में आवाज चली जाती थी। सांस लेने व बोलते में दिक्कत होती थी। काउंसलिंग में सामने आया कि उसका बहुत करीबी दोस्त बिछड़ने के चलते उसे दौरे पड़ने लगे थे। इसी के चलते वह सदमे में थी। डॉक्टर ने समझाया और परिजनों की भी काउंसलिंग की। इसके बाद वह ठीक है।
वर्तमान में हिस्टीरिया की दिक्कत बच्चों में काफी ज्यादा बढ़ गई। इसका उपचार ज्यादातर मनोचिकित्सा और दवाई से हो जाता है। कुछ लोग इसे भूत-प्रेत का साया समझ लेते हैं। मनोचिकित्सा के माध्यम से रोगी की नकारात्मकता को बदलकर उसमें सकारात्मक सोच का अनुभव कराया जाता है। -डॉ.रोहताश ईसा, क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक-राजकीय मेडिकल कॉलेज