सर्वे रिपोर्ट : ‘जेन-जी’ युवाओं के बेबाकीपन से टूट रही सामाजिक मर्यादाएं
बरेली। संचार क्रांति के युग में बच्चों के पालन पोषण का तरीका बदल रहा है। अभिभावकों के प्रति बच्चों में भावनात्मकता कम हो रही है, जो सामाजिक ताने-बाने में खिंचाव की वजह बन रहा है। सामाजिक मर्यादाएं भी टूट रही हैं। पिछली पीढि़यों की तुलना में वे अपनी पहचान बनाने के लिए तत्पर हैं। इसका खुलासा जेनरेशन जेड (‘जेन जी’) की सर्वे रिपोर्ट में हुआ है।
मनोचिकित्सक डॉ. आशीष कुमार के मुताबिक वर्ष 2000 के बाद जन्मे बच्चों को जेनरेशन जेड के अंतर्गत माना गया है। इसे बोलचाल में ‘जेन जी’ कहते हैं। उनके अनुसार मनोविज्ञान में प्रत्येक पीढ़ी के लिए एक नामकरण होता है जो पीढि़यों के बदलाव को इंगित करता है। वर्ष 2000 में संचारक्रांति का दौर शुरू था। इसलिए अब करीब 23 सालों में तकनीकी हावी हो गई है। इस कालखंड में जन्मे बच्चों के पास सूचना का भंडार है, लेकिन इसका बेहतर उपयोग होने के बजाय दुरुपयोग हुआ है। सर्वे में इसकी पुष्टि हुई है। बीते दस सालों में बच्चों का पालन-पोषण भी डिजिटल हो गया है, जो पारिवारिक-सामाजिक रिश्तों को तोड़-मरोड़ रहा है।
विचार न मिलना बन रहा पारिवारिक टकराहट की वजह
रिपोर्ट के मुताबिक ‘जेन जी’ के युवाओं में विविधता के प्रति आकर्षण है। अभिभावकों से विचार न मिलना पारिवारिक टकराहट की वजह है। ब्रांडिंग और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को प्राथमिकता देने के चलते सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठा रहे हैं। सांस्कृतिक मानदंड को बदलने की चाहत से सामाजिक मर्यादाएं भी टूट रही हैं।
तेजी से आगे बढ़ने की चाहत में हो रहे निराश
मनोचिकित्सक के मुताबिक ”जेन जी” में जन्मे बच्चों में 90 फीसदी में धैर्य की कमी है। तेजी से आगे बढ़ने और आसमान छू लेने की चाहत पूरी न होने पर वे जल्द निराश हो जाते हैं। मानसिक तनाव में जीते हैं। सूचनाओं का भंडार है, लिहाजा, उनमें क्या चुनना है यह तय नहीं कर पा रहे। अभिभावक सुधारने में जुटे हैं पर बच्चों पर इसका नकारात्मक प्रभाव हो रहा है। सुधार की गुंजाइश भी महज 40 फीसदी है।
बगैर कमाए खर्च करने की आदत बनी दिक्कत
”जेन जी” के बच्चों में दूसरों की नकल करके दिखावे की प्रवृत्ति है। बगैर कमाए खर्च करने की आदत से वे आर्थिक महत्व और उसकी उपयोगिता से अपरिचित हैं। इसे निजी कंपनियां भुना रही हैं। जेन जी के बच्चों में अभिभावकों के सहयोग के बजाय उनकी सलाह को दरकिनार करके आगे बढ़ने की चाहत है। परिवार का भार संभालने की क्षमता कम हो रही है। बगैर जांच परख के सोशल मीडिया पर रील बनाने, पोस्ट वायरल करने का चस्का बढ़ा है।
जेन जेड सर्वे की खास बातें
– 54 फीसदी युवा, 37 फीसदी युवतियां तनावग्रस्त हैं।
– 79 फीसदी ऑनलाइन साझा कर रहे समस्याएं।
– 76 फीसदी के लिए नौकरी बोझ, 74 फीसदी असफल।
– 80 फीसदी बेबाक, व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की चाहत।
– 42 फीसदी क्षमता का नहीं कर रहे सार्थक उपयोग।
– 51 फीसदी का शोषण, 41 फीसदी करते हैं विरोध।
– 19 फीसदी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर और 17 फीसदी मिलकर संवाद करते हैं।
सर्वे में शामिल हुए 22 हजार से ज्यादा लोग
डॉ. आशीष के मुताबिक ”जेन जी” (जेनरेशन जेड) में जन्मे युवाओं की मानसिक स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय संस्था डेलॉइट ने सर्वे किया है। इसमें 44 देशों के 22 हजार लोग शामिल रहे। भारत के भी सभी राज्यों में संचालित मनोवैज्ञानिक केंद्रों से इनपुट लिए गए। इसमें बरेली भी शामिल रहा। साथ ही, सीधे भी आम लोगों से संपर्क किया गया। सर्वे वर्ष 2023 में किया गया। इसकी रिपोर्ट बीते माह जारी हुई है। संस्था का शोध अलग-अलग कार्यक्षेत्र से जुड़े लोगों पर केंद्रित है।



