बदायूं

Budaun News: ककोड़ा मेले में पहले बजते थे ढोल-मजीरे, अब म्यूजिक सिस्टम से गूंज रहा गंगा तट

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Modernity is losing the cultural identity of Kakoda Mela in Budaun

गंगा तट पर बसा ककोड़ मेला
– फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बदायूं के कादरचौक में गंगा तट पर लगने वाला ककोड़ा मेला यूं तो ग्रामीण परिवेश पर आधारित मेला है, लेकिन आधुनिकता के दौर में इसकी सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। पहले तंबुओं में ढोल की थाप और मजीरे की आवाज सुनाई देती थी, लेकिन अब इसकी जगह आधुनिक म्यूजिक सिस्टम ने ली है। हालांकि मेले में आने वाले ग्रामीण लोग आज भी परंपराओं को बरकरार रखने की कोशिश कर रहे हैं।

गंगा की तलहटी में लगने वाला मेला ककोड़ा शुरू हो गया है और लगातार लोग अपने तंबू लगा रहे हैं। 15 दिनों तक चलने वाले इस मेला में दूरदराज से लोग अपना पूरा साजो सामान लेकर आते हैं, जिसमें वह मनोरंजन के लिए संगीत का भी सामान लाते हैं। पूर्व में देखा जाता था कि पहले जो लोग मेला में आते थे वह पूरी तरह से भक्ति से डूबे रहते थे। गांव की महिलाएं एक स्थान पर बैठकर गंगा मैया के गीत गाती थी और उनके गीतों को सुनने के लिए लोग अपने तंबू से निकलकर वहां पर पहुंच जाते थे, लेकिन आधुनिकता ने इसको काफी प्रभावित कर दिया है। 

अब भजन कीर्तन के स्थान पर संगीत के आधुनिक सिस्टम ने ले ली है ऐसे में मेला की रंगत भी फीकी पड़ती नजर आने लगी है। अब डीजे पर फूहड़ता भरे गाने ज्यादा सुनाई देते हैं। मनोरंजन के लिए जो साधन मेला में लगते हैं, उनमें फिल्मी गीत ही अधिक बजते हैंए जबकि पहले यहां आल्हा की तान सुनाई देती थी।


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