ककोड़ा मेला: मोहम्मद अब्दुल्ला ने शुरू किया था ककोड़ देवी का मेला, अंग्रेजों ने दी भव्यता; जानिए इतिहास

गंगा किनारे स्थित ककोड़ देवी मंदिर
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रुहेलखंड का मिनी कुंभ कहे जाने वाले बदायूं के ककोड़ा मेले का इतिहास पांच सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। कहा जाता है कि इस इलाके पर वर्चस्व के लिए रुहेलाओं ने आक्रमण किया तो ककोड़ देवी ने यहां के जनमानस की रक्षा की। इस युद्ध में देवी का सिर धड़ से अलग हो गया था। उनके कबंध (धड़) ने युद्ध कर रुहेलाओं को परास्त किया। मंदिर में देवी की प्रतिमा भी इसी स्थिति में स्थापित है। सिर और धड़ अलग-अलग रखा है।
अफगानिस्तान के रूह इलाके से 18वीं सदी के प्रारंभ में दाऊद खां नामक व्यक्ति अपने साथियों के साथ यहां घोड़ों का व्यापार करने आया था। व्यापार में सफल न होने पर इन लोगों ने स्थानीय जमींदारों की सेना में नौकरी कर ली। जब इनकी संख्या तीन-चार सौ हो गई तो दाऊद खां के बेटे अली मोहम्मद खां ने छोटे जमीदारों को परास्त कर अपने अधीन कर लिया। उसी वक्त दिल्ली के बादशाह मोहम्मद शाह ने अली मोहम्मद खां को नवाब का दर्जा दे दिया।
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वर्ष 1749 में अली मोहम्मद खां के इंतकाल के बाद रुहेलखंड के सभी जिलों को उनके छह बेटों और अन्य सरदारों में बांट दिया गया। उझानी और उसके आसपास का इलाका नवाब के बड़े बेटे मोहम्मद अब्दुल्ला के हिस्से में आया। वह वहीं पर गढ़ी बनाकर रहने लगे। सर्प पालने व शिकार करने के शौकीन नवाब अब्दुल्ला कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए। बताते हैं उन दिनों गंगा ककोड़ देवी मंदिर के पास से होकर बहती थीं। वहीं पर उनकी मुलाकात ध्यान मुनि नाम के संत से हुई।
मुनि के आदेश पर अब्दुल्ला ने गंगा में स्नान और ककोड़ देवी का नियमित दर्शन शुरू किया। थोड़े ही दिन में नवाब का कुष्ठ रोग ठीक हो गया। गंगा एवं ककोड़ देवी के इस चमत्कार से प्रभावित होकर नवाब ने वहां मेला लगवाना शुरू किया। इसमें पूरे रुहेलखंड से लोग मेले में आकर गंगा किनारे प्रवास करने लगे। कालांतर में यही मेला ककोड़ा के नाम से विख्यात हुआ।